बड़ी राहत: अभियोजन पक्ष नहीं दे पाया सबूत, सिर्फ तीन तारीखों में वकील ने पलट दिया पूरा मामला
- 29 मार्च 2021 को हुआ था विवाद, इलाज के दौरान हुई थी सूरज मुंडा की मौत।
- 05 साल बाद पुलिस ने आरोपी को किया था गिरफ्तार, जांच की खामियों का मिला लाभ।
Ranchi News: राजधानी के जगन्नाथपुर थाना क्षेत्र के चर्चित सूरज मुंडा हत्याकांड में सिविल कोर्ट रांची के अपर न्यायायुक्त शैलेंद्र कुमार की अदालत ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने न्यायिक तत्परता दिखाते हुए मात्र 29 दिनों के भीतर ही मामले की सुनवाई पूरी कर ली और आरोपी कार्तिक उर्फ बादल दास को ससम्मान बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि पुलिसिया जांच में कई गंभीर खामियां थीं, जिसके कारण अभियोजन पक्ष आरोपी पर लगे आरोपों को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा।
सिर्फ तीन तारीखों में हुई 6 गवाहों से जिरह
मामले में बचाव पक्ष के अधिवक्ता प्रितांशु कुमार सिंह ने अदालत के समक्ष बेहद प्रभावी दलीलें पेश कीं। उन्होंने मात्र तीन तारीखों के भीतर अभियोजन पक्ष के सभी 6 गवाहों से तीखी जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) की। इस दौरान उन्होंने पुलिस अनुसंधान की उन बड़ी कमियों को उजागर किया, जिसने पूरे केस की नींव हिलाकर रख दी। अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए आरोपी को संदेह का लाभ (बेनिफिट ऑफ डाउट) दिया।
जांच में रहीं ये तीन बड़ी कसरतें, जिससे कमजोर हुआ केस:
- पहचान परेड नहीं: घटना के बाद आरोपी की कोई आधिकारिक शिनाख्त (टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड) नहीं कराई गई।
- मेडिकल रिपोर्ट गायब: मृतक के इलाज से जुड़े जरूरी चिकित्सकीय दस्तावेज अदालत के समक्ष पेश नहीं किए गए।
- डॉक्टर का बयान नहीं: जिस डॉक्टर ने घायल का इलाज किया था, उसका बयान पुलिस ने रिकॉर्ड ही नहीं किया था।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन की कहानी के अनुसार, 29 मार्च 2021 को सूरज मुंडा और आरोपी कार्तिक उर्फ बादल दास के बीच किसी बात को लेकर हिंसक विवाद हुआ था। इस दौरान सिर पर गंभीर चोट लगने से सूरज घायल हो गया था। अस्पताल से इलाज कराकर घर लौटने के बाद अचानक उसकी तबीयत फिर बिगड़ी और 5 अप्रैल 2021 को उसकी मौत हो गई। पुलिस ने इस मामले में जगन्नाथपुर थाना कांड संख्या 132/2021 दर्ज किया था।
तारीख-दर-तारीख: ऐसे चला घटनाक्रम
- 18 फरवरी: घटना के करीब पांच साल बाद पुलिस ने आरोपी बादल दास को गिरफ्तार कर जेल भेजा।
- 22 मई: जेल में रहते हुए आरोपी पर अदालत ने विधिवत आरोप (फ्रेमिंग ऑफ चार्ज) तय किए।
- 20 जून: मात्र 28 दिनों के स्पीडी ट्रायल के बाद अदालत ने आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया।

