तीन लोगों के बाइक पर सवार होने को 50 फीसदी अंशदायी लापरवाही मानना गलत, हाईकोर्ट ने हटाया ट्रिब्यूनल का फैसला
67 हजार का मुआवजा बढ़कर 16.50 लाख, 37 हजार से 11.25 लाख हुआ : हाईकोर्ट ने 50% कटौती भी हटाई
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल दो पीड़ितों के मुआवजे में भारी बढ़ोतरी करते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के फैसले को संशोधित किया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक की अदालत ने विकाश कुमार केशरी का मुआवजा 67,500 रुपये से बढ़ाकर 16.50 लाख रुपये और यशोदा देवी उर्फ सुशीला देवी का मुआवजा 37,600 रुपये से बढ़ाकर 11.25 लाख रुपये कर दिया। दोनों को मुआवजा राशि पर दावा याचिका दायर करने की तारीख से भुगतान तक 7.5 फीसदी वार्षिक ब्याज भी मिलेगा। अदालत ने बीमा कंपनी को छह सप्ताह में बढ़ी हुई राशि जमा करने का निर्देश दिया है।
मामला 8 अक्तूबर 2008 को हुए सड़क हादसे से जुड़ा है। दोनों अपीलकर्ताओं समेत तीन लोग मोटरसाइकिल पर सवार थे। एक ट्रैक्टर ने मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी थी। हादसे में विकाश कुमार केशरी को दाहिने घुटने में स्थायी जकड़न, पैर छोटा होने और दृष्टि संबंधी परेशानी के साथ 60 फीसदी चिकित्सकीय दिव्यांगता हुई। वहीं यशोदा देवी को श्रोणि और घुटने में गंभीर चोट लगी तथा बाद में स्थायी कमजोरी और घुटने में अस्थिसंधिशोथ की समस्या रही। दोनों का करीब एक वर्ष तक इलाज चला।
मुआवजे की नई दरें (तुलनात्मक विवरण)
| दावेदार | ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया मुआवजा | हाईकोर्ट द्वारा बढ़ाया गया कुल मुआवजा |
| विकास कुमार केसरी | ₹67,500/- | ₹16,50,000/- |
| यशोदा देवी उर्फ सुशीला देवी | ₹37,600/- | ₹11,25,000/- |
दस्तावेज नहीं होने पर आय को पूरी तरह नकारना गलत
हाईकोर्ट ने कहा कि आय का दस्तावेजी प्रमाण नहीं होने मात्र से घायल व्यक्ति की बताई आय को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। दोनों ने अपनी आय के संबंध में लगातार बयान दिए थे। अदालत ने परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विकाश की मासिक आय 6,500 रुपये और यशोदा देवी की 5,500 रुपये मानी। अदालत ने विकाश के मामले में भविष्य की आय में 40 फीसदी और यशोदा देवी के मामले में भी 40 फीसदी की वृद्धि जोड़ी। इसके बाद क्रमश: 17 और 15 का गुणक लगाकर कार्यात्मक दिव्यांगता के आधार पर भविष्य की आय के नुकसान की गणना की गई।
चिकित्सकीय दिव्यांगता से ज्यादा महत्वपूर्ण कार्यात्मक दिव्यांगता
अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजा तय करते समय केवल चिकित्सकीय दिव्यांगता का प्रतिशत देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि चोट का व्यक्ति की कमाई की क्षमता पर वास्तविक असर कितना पड़ा है। विकाश कृषि उपज की खरीद-बिक्री का काम करता था। घुटने की जकड़न, पैर छोटा होने और दृष्टि संबंधी परेशानी के कारण उसके लिए चलना-फिरना और लंबे समय तक शारीरिक गतिविधि करना प्रभावित हुआ। इसलिए उसकी कार्यात्मक दिव्यांगता 70 फीसदी मानी गई। इसी तरह कृषि मजदूरी और दुकान चलाने वाली यशोदा देवी की कार्यात्मक दिव्यांगता 60 फीसदी तय की गई। अदालत ने कहा कि कृषि कार्य में खड़े रहने, चलने, झुकने, उठाने और सामान ढोने जैसी गतिविधियां शामिल होती हैं, जिन पर उनकी चोट का सीधा असर पड़ा।
तीन सवारी को आधार बनाकर 50 फीसदी कटौती गलत
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा मुआवजे में 50 फीसदी कटौती को भी गलत करार दिया। अदालत ने कहा कि मोटरसाइकिल पर तीन लोगों के सवार होने से नियम का उल्लंघन जरूर हुआ, लेकिन केवल इस आधार पर अंशदायी लापरवाही नहीं मानी जा सकती। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि तीन लोगों के सवार होने और हादसे के बीच सीधा संबंध था या इससे चोट की गंभीरता बढ़ी थी। बीमा कंपनी ऐसा कोई संबंध साबित नहीं कर सकी। इस आधार पर हाईकोर्ट ने 50 फीसदी अंशदायी लापरवाही का निष्कर्ष रद्द कर दिया। इसके साथ ही चिकित्सा खर्च, भविष्य के इलाज, विशेष आहार, आने-जाने का खर्च, दर्द और पीड़ा तथा जीवन की सुविधाओं के नुकसान के लिए भी अलग-अलग राशि निर्धारित की गई। अदालत ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए बीमा कंपनी को छह सप्ताह के भीतर बढ़ी हुई राशि जमा करने का निर्देश दिया है। राशि जमा होने के बाद रजिस्ट्री को दोनों पीड़ितों के बैंक खातों में नियमित बैंकिंग माध्यम से भुगतान करने का निर्देश दिया गया है।