राहत: रांची सिविल कोर्ट ने सुनाया फैसला, अदालत ने माना- डॉक्टर की गवाही और इंजरी रिपोर्ट के बिना जुर्म साबित नहीं
विवाद: साल 2019 में बाइक गिराने के विरोध पर हुआ था हिंसक टकराव, एक सह-आरोपी की ट्रायल के दौरान हो चुकी है मौत
- स्वतंत्र गवाह मुकरे: कोर्ट में दो गवाह पूरी तरह होस्टाइल (विरोधी) हो गए, तीसरे ने कहा- लड़ाई देखी पर यह नहीं पता किसने किसको मारा।
- आईओ की गवाही भी नहीं: केस की जांच करने वाले मुख्य अनुसंधान अधिकारी (IO) का कोर्ट में बयान दर्ज नहीं कराया जा सका।
Ranchi News: रांची के पिठोरिया थाना क्षेत्र के ऊपर कोंकी गांव में साल 2019 में हुए बहुचर्चित जानलेवा हमले और मारपीट के मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। रांची सिविल कोर्ट के अपर न्यायायुक्त (AJC-XVII) संजीव झा की अदालत ने पुख्ता और स्वतंत्र साक्ष्यों के अभाव में एक ही परिवार के सात आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष (प्रॉसीक्यूशन) आरोपियों के खिलाफ गैर-कानूनी मजमा लगाने, जानलेवा हमला करने और चोरी के आरोपों को ‘संदेह से परे’ साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। अदालत से दोषमुक्त होने वालों में जैनुल अंसारी (75 वर्ष), उनके तीन बेटे तबरक अंसारी (45 वर्ष), बसिरुल अंसारी (39 वर्ष), सफिरुल अंसारी (36 वर्ष), पोते राजा उर्फ राजू (30 वर्ष) व शफीक अंसारी (30 वर्ष) और बहू सहरुन निशा (42 वर्ष) शामिल हैं। मामले के एक अन्य आरोपी मैजुल अंसारी की ट्रायल के दौरान ही मौत हो चुकी है।
बाइक गिराने और टोकने पर शुरू हुआ था विवाद
दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, घटना 23 और 24 दिसंबर 2019 की है। सूचक रकीब राजा के चाचा इस्लाम अंसारी ने सड़क किनारे अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की थी, जिसे आरोपी मैजुल अंसारी (मृतक) ने लात मारकर गिरा दिया था। जब इसका विरोध किया गया, तो गाली-गलौज और मारपीट की नौबत आ गई।
अगले दिन 24 दिसंबर की सुबह करीब 09:30 बजे, जब सूचक का बड़ा भाई शफीक अंसारी रांची जाने के लिए निकला, तो सभी आरोपियों ने उसे घेर लिया। आरोप था कि तबरक अंसारी ने दाउली (धारदार हथियार) से उसके सिर पर वार किया, जबकि अन्य आरोपियों ने रॉड, लाठी, तलवार से हमला कर उसे लहूलुहान कर दिया। बीच-बचाव करने आए सूचक रकीब राजा और उसके चाचा मुर्तजा अंसारी को भी पीटा गया और 20 हजार रुपये व मोबाइल छीनने का आरोप लगाया गया।
क्यों कमजोर हुआ सरकारी पक्ष? (अदालत की मुख्य टिप्पणियां)
1. मेडिकल एविडेंस और डॉक्टर की गवाही शून्य: अदालत ने पाया कि घायलों का इलाज कांके, सदर अस्पताल और रिम्स में होने का दावा तो किया गया, लेकिन पूरे ट्रायल के दौरान कोर्ट में न तो किसी डॉक्टर की गवाही हुई और न ही घायलों की ‘इंजरी रिपोर्ट’ (जख्म प्रतिवेदन) पेश की जा सकी। इससे हथियारों के इस्तेमाल और चोट की गंभीरता साबित नहीं हो सकी।
2. स्वतंत्र चश्मदीद गवाह हुए होस्टाइल: कोर्ट में कुल 6 गवाहों की जांच हुई। इनमें से दो स्वतंत्र गवाह (P.W-1 मो. सैफुद्दीन और P.W-2 तनवीर अंसारी) पूरी तरह मुकर गए (होस्टाइल)। तीसरे गवाह सगीर अंसारी ने केवल लड़ाई होने की बात कही, लेकिन हमलावरों को पहचानने से इनकार कर दिया।
3. मुख्य आईओ की गवाही न होना: घटना की पूरी कड़ियों की जांच करने वाले मुख्य आईओ (अनुसंधान अधिकारी) को कोर्ट में पेश नहीं किया जा सका। चार्जशीट दाखिल करने वाले दूसरे पुलिस अधिकारी (P.W-6 संतोष महतो) ने गवाही दी, लेकिन उन्हें घटना या हमले की कोई जमीनी जानकारी नहीं थी।
अभियोजन पक्ष के साथ पुलिस जांच पर उठे सवालः
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि केवल पीड़ित और सूचक के बयानों के आधार पर, बिना किसी चिकित्सीय और स्वतंत्र पुष्टि के, आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ (संदेह का लाभ) देते हुए सभी सात आरोपियों को भादवि की धारा 148, 341, 307/149, 324/149, 325/149 और 379/149 के आरोपों से बरी कर दिया। चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर थे, इसलिए उन्हें बेल बांड की देनदारियों से भी मुक्त कर दिया गया। अदालत में आरोपियों की ओर से अधिवक्ता अजय कुमार और राज्य की ओर से अपर लोक अभियोजक (Addl. P.P) मनोज कुमार सिंह ने पक्ष रखा था।