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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हिस्ट्रीशीटरों को जमानत देते समय आंखों पर पट्टी बांधने वाला नजरिया न अपनाएं अदालतें

Devesh Ananad
By Devesh Ananad On 25 Apr, 2021
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New Delhi: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि अदालतों को हिस्ट्रीशीटरों को जमानत देने के वक्त आंखों पर पट्टी बांधने वाला नजरिया नहीं अपनाना चाहिए। ऐसे लोगों को छोड़ने से पहले इस बात पर जरूर गौर करना चाहिए कि इसका गवाहों और पीड़ित के निर्दोष परिजनों पर क्या असर पड़ेगा। इसके साथ ही प्रधान न्यायाधीश (अब सेवानिवृत्त) एसए बोबडे इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के आरोपित को जमानत देने के आदेश को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का कहना है कि आजादी जरूरी है, फिर चाहे एक व्यक्ति ने कोई अपराध ही क्यों न किया है। लेकिन अदालतों को भी यह देखने की जरूरत है उनकी रिहाई से किसके जीवन को खतरा है। क्या किसी गवाह या पीडि़त के जीवन को जमानत पर छोड़े जानेवाले अपराधी से खतरा है। यह बताने की जरूरत नहीं कि ऐसे मामलों में कोर्ट आंखों पर पट्टी बांधकर किसी आरोपित को इससे परे मान ले। इसके लिए अदालत केवल उन्हीं पक्ष की न सुनें जो उनके समक्ष पेश हुए हैं बल्कि अन्य पहलुओं का भी ध्यान रखें।

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बता दें कि याचिकाकर्ता सुधा सिंह आरोपी अरुण यादव के हाथों मारे गए राज नारायण सिंह की पत्नी हैं। 52 वर्षीय राज नारायण सिंह उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कोआपरेटिव सेल के अध्यक्ष थे। वर्ष 2015 में आजमगढ़ के बेलैसिया में चहलकदमी के दौरान गोली मारकर मार दिया गया था। आरोपी अरूण यादव एक शार्पशूटर है।

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बीते दिनों मुख्तार अंसारी को पंजाब की रूपनगर जेल से उत्तर प्रदेश के बांदा की जेल भेजने का आदेश करते हुए कहा था कि कानून के राज को चुनौती मिलने पर हम असहाय दर्शक बने नहीं रह सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चाहे कैदी अभियुक्त हो, जो कानून का पालन नहीं करेगा वह एक जेल से दूसरी जेल भेजे जाने के निर्णय का विरोध नहीं कर सकता है।

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देवेश आनंद को पत्रकारिता जगत का 15 सालों का अनुभव है। इन्होंने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान में काम किया है। अब वह इस वेबसाइट से जुड़े हैं।

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