Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट जल संसाधन विभाग के शीर्ष अधिकारियों को अवमानना मामले में सभी पर 25 – 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। जस्टिस एसके द्विवेदी की अदालत ने एक अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए विभाग के प्रधान सचिव प्रशांत कुमार, मुख्य अभियंता जमील अख्तर, अधीक्षण अभियंता संजीव कुमार और कार्यपालक अभियंता रंजीत कुजूर को 25 – 25 हजार रुपये हर्जाना के रूप में रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 12 सितंबर को निर्धारित करते हुए कहा है कि यदि उक्त तिथि तक राशि जमा नहीं की गयी, तो सभी अधिकारियों को पुन:कोर्ट में सशरीर हाजिर होना होगा। यह राशि बाद में झालसा को स्थानांतरित की जाएगी।
सुनवाई के दौरान सभी अधिकारी अदालत में सशरीर हाजिर हुए और कोर्ट से माफी मांगी। इस पर कोर्ट ने कहा की सिर्फ माफी से बात खत्म नहीं हो सकती, क्योंकि यह जानबूझकर किया गया उल्लंघन है। अदालत ने सभी को अवमानना का दोषी मानते हुए कहा- अवमानना की शक्ति अदालत को संविधान से मिली है। इसका इस्तेमाल बेहद सतर्कता और दुर्लभ परिस्थितियों में ही होना चाहिए। लेकिन जब न्यायपालिका के आदेशों का जानबूझकर पालन न किया जाए, तब अदालत के पास कठोर कार्रवाई के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
अदालत ने अधिकारियों की लंबी सेवा और एक अफसर की सेवानिवृत्ति (31 अगस्त 2025) को देखते हुए नरमी बरती और हर अधिकारी पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया। यह राशि एक हफ्ते के भीतर रजिस्ट्रार जनरल, झारखंड हाईकोर्ट के पास जमा करनी होगी। बाद में यह रकम झारखंड स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को ट्रांसफर कर दी जाएगी।
कोर्ट ने कहा कि सभी अफसर पिछली सुनवाई में कैजुअल ड्रेस में हाजिर हुए थे। अदालत ने चेतावनी दी कि भविष्य में जब भी उन्हें पेश होना पड़े, वे गरिमापूर्ण वेशभूषा में आएं।
इस संबंध में लखन प्रसाद यादव ने अवमानना याचिका दायर की है। प्रार्थी को क्लास थ्री कर्मचारी के रूप में काम करने की अवधि का वेतन देने का आदेश हाईकोर्ट ने पूर्व में ही दिया था। इस आदेश का पालन करने में राज्य सरकार की ओर से कई बार देरी की गयी। सरकार सुप्रीम कोर्ट तक गयी थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए चार हफ्ते में आदेश का पालन करने का निर्देश दिया था। इस मामले में 22 अगस्त को सुनवाई के दौरान प्रार्थी की ओर से अदालत को बताया गया की विभाग ने सिर्फ आंशिक भुगतान किया है। विभाग ने प्रार्थी को सिर्फ ₹11,87,230 रुपये दिए ,जबकि एक लाख का भुगतान गलत ढंग से दिखाकर शपथपत्र भी दाखिल कर दिया गया। अदालत ने इसे कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश माना।