Ranchi News: झारखंड में डायन प्रथा के नाम पर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को जड़ से मिटाने के लिए शनिवार को देश और राज्य की शीर्ष न्यायपालिका एक मंच पर नजर आई। झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार (JHALSA) द्वारा “महिलाओं के खिलाफ अपराध” (विशेषकर डायन प्रथा) विषय पर आयोजित राज्य स्तरीय कोलोकियम (संवाद) में कानूनी सुधारों के साथ-साथ सामाजिक पुनर्वास पर जोर दिया गया ।
संविधान और हकीकत की खाई पाटना चुनौती: जस्टिस विक्रम नाथ
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और NALSA के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध गहरी सामाजिक असमानताओं को दर्शाते हैं । उन्होंने जोर देकर कहा कि डायन प्रथा जैसे घृणित कृत्य सामाजिक नियंत्रण का एक तरीका हैं । जस्टिस नाथ ने स्पष्ट किया कि न्याय प्रणाली की प्रभावशीलता तभी मानी जाएगी, जब वह पीड़ितों को समाज में वापस सम्मान दिला सके और उनके पुनर्वास के लिए सक्रिय कदम उठाए ।

विधिक सुधार और संस्थागत तालमेल
▪ जस्टिस विक्रम नाथ (सुप्रीम कोर्ट)
उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध गहरी सामाजिक असमानताओं से जुड़े हैं। डायन प्रथा को गंभीर लैंगिक हिंसा बताते हुए उन्होंने “सर्वाइवर-सेंट्रिक जस्टिस” पर जोर दिया—यानी पीड़िता के पुनर्वास, सम्मानजनक जीवन और न्याय तक आसान पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का हवाला देते हुए कहा कि डायन प्रथा जैसी कुरीतियाँ समानता के संवैधानिक वादे पर चोट करती हैं । उन्होंने झारखंड डायन प्रथा निवारण अधिनियम और SC/ST एक्ट के कड़े कार्यान्वयन की वकालत की ।
▪ जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह (सुप्रीम कोर्ट)
उन्होंने कहा कि डायन प्रथा जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि संविधान में बराबरी के अधिकार के बावजूद जमीनी स्तर पर न्याय अधूरा है। उन्होंने कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन, मुआवजा, पुनर्वास और लीगल सर्विस संस्थाओं की सक्रिय भूमिका पर जोर दिया।
▪ जस्टिस एम.एस. सोनक (मुख्य न्यायाधीश, झारखंड हाईकोर्ट)
उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और डायन प्रथा सामाजिक असमानता और नियंत्रण की मानसिकता से जुड़ी है। केवल कानून पर्याप्त नहीं, बल्कि संस्थागत समन्वय और पीड़ितों के सामाजिक पुनर्स्थापन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कानून अकेले समाज को नहीं बदल सकता । उन्होंने संस्थागत प्रतिक्रिया को “पीड़ित-केंद्रित” बनाने और सजा से आगे बढ़कर पीड़ितों के सामाजिक एकीकरण पर ध्यान केंद्रित करने को कहा ।
▪ जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद (झारखंड हाईकोर्ट)
उन्होंने कानूनी सेवा संस्थाओं की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि कमजोर वर्गों तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही जागरूकता, मध्यस्थता और समन्वित प्रयासों से ऐसे अपराधों पर नियंत्रण संभव है। उन्होंने झालसा की ‘प्रोजेक्ट सुरक्षा’ और ‘प्रोजेक्ट बाल सुरक्षा’ जैसी पहलों का विवरण दिया, जो वंचित वर्गों को न्याय दिलाने में सेतु का काम कर रही हैं ।
इन सभी वक्तव्यों का मुख्य संदेश यही रहा कि सिर्फ कानून नहीं, बल्कि जागरूकता, संस्थागत तालमेल और पीड़ित-केंद्रित व्यवस्था से ही महिलाओं के खिलाफ अपराध पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है।

कार्यक्रम के दौरान न्याय को और सुलभ बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए:
- JHALSA चैटबॉट: कानूनी सहायता की जानकारी के लिए विशेष चैटबॉट लॉन्च किया गया ।
- आउटरीच प्रोग्राम: 90 दिनों का विशेष जागरूकता अभियान शुरू किया गया ।
- वर्चुअल उद्घाटन: चक्रधरपुर (पश्चिमी सिंहभूम) में अनुमंडल विधिक सेवा समिति का ऑनलाइन शुभारंभ हुआ ।
- विशेष लोक अदालत: एनआई एक्ट (N.I. Act) के मामलों के लिए सभी जिलों में विशेष लोक अदालत की शुरुआत की गई ।
तकनीकी सत्रों में मंथन
विशेषज्ञों ने तीन तकनीकी सत्रों में घरेलू हिंसा, मानव तस्करी, बाल विवाह और डाइन प्रथा के सामाजिक-कानूनी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की । इसमें गवाहों की सुरक्षा, पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजे और उनके मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को भी प्रमुखता से रखा गया । इस संवाद में झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीशों सहित न्यायिक अधिकारी, पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए, जिन्होंने महिलाओं के लिए एक सुरक्षित समाज बनाने का संकल्प लिया

