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मेयर का अधिकार कम करने का मामला पहुंच हाईकोर्ट, महाधिवक्ता के मंतव्य को विभाग ने माना कानून

Ranchi: Moyer मेयर के अधिकारों को कम करने का मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है। इसको लेकर संजय कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर सरकार के उस आदेश को निरस्त करने की मांग की है, जिसमें महाधिवक्ता के मंतव्य को कानून मानकर सभी नगर पालिका में पालन करने का आदेश दिया गया है।

संजय कुमार की ओर से अधिवक्ता अपराजिता भारद्वाज और तान्या सिंह ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है। अपराजिता भारद्वाज ने बताया कि नगर विकास विभाग ने महाधिवक्ता राजीव रंजन के मंतव्य को संलग्न करते हुए नौ सितंबर को एक आदेश जारी किया है।

जिसके तहत नगर निगम की मेयर और निकायों के अध्यक्षों का अधिकार कम कर दिया गया है और मंतव्य के तहत ही कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। याचिका में कहा गया है कि महाधिवक्ता की गलत व्याख्या को कानून के रूप में मान्यता देते हुए राज्य सरकार का कोई विभाग इस तरह का निर्देश जारी नहीं कर सकता है।

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जब नगर निगम अधिनियम और संविधान में निहित प्रविधानों की अनदेखी एवं गलत व्याख्या करते हुए ऐसा मंतव्य दिया गया है। इसमें मेयर अथवा निकायों के अध्यक्षों के अधिकारों को लगभग समाप्त कर दिया गया है और नगर निगम में एजेंडा सहित अंतिम निर्णय और बैठक की तिथि निर्धारित करने का अधिकार मेयर की बजाय नगर आयुक्त एवं सीईओ को दे दिया गया है।

याचिका में कहा गया है कि नगर विकास विभाग के द्वारा महाधिवक्ता से नगर पालिका अधिनियम के प्राविधानों के संबंध में मंतव्य लिया गया था। लेकिन महाधिवक्ता का मंतव्य संविधान और म्यूनिसिपल एक्ट-2011 के ठीक विपरीत है। यदि महाधिवक्ता द्वारा प्रविधानों की गलत व्याख्या की गई है।

ऐसे नगर विकास से अपेक्षित था कि सरकार के स्तर पर संबंधित मंतव्य पर यथोचित निर्णय जाना चाहिए न कि महाधिवक्ता के मंतव्य को ही सरकुलेट कर कानून मान लिया जाए। उक्त निर्देश के बाद नगर निगम में गलत निर्णय लिए जा रहे हैं। रांची नगर निगम का उदाहरण देते हुए कहा है कि एक व्यक्ति को सेवानिवृत्ति के कई महीनों बाद भूतलक्षी प्रभाव से सेवा विस्तार दिया गया है।

निविदा के मामलों में मेयर की आपत्ति के बाद भी निर्णय लिए जा रहे हैं। कहा गया है कि यदि सरकार के निर्देश को निरस्त नहीं किया गया तो महाधिवक्ता का गलत मंतव्य ही एक कानून के समान लागू हो जाएगा। ऐसे में लोकतांत्रिक विधि से चुने गए जनप्रतिनिधियों का कोई महत्व नहीं रहेगा। इसलिए इसे निरस्त किया जाए।

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