Ranchi: झारखंड हाई कोर्ट (HC News) के जस्टिस एसके द्विवेदी की अदालत ने एक मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि कानून से संघर्षरत नाबालिग को जेजे एक्ट की धारा 12 के तहत जमानत देना सामान्य नियम है। केवल इस आशंका के आधार पर जमानत से इन्कार नहीं किया जा सकता कि रिहा होने पर नाबालिग का संपर्क अपराधियों से हो सकता है। इसके लिए ठोस सामग्री और उचित आधार होना जरूरी है।
जमानत पर रिहा करने का आदेश
हाई कोर्ट ने प्रार्थी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत नाबालिग एस साव की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में हजारीबाग के किशोर न्याय बोर्ड (जेजे बोर्ड) और एडिशनल सेशन जज-सह-स्पेशल जज, बाल न्यायालय के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें उसे जमानत देने से इन्कार किया गया।
घटना समय नाबालिग था साहू
मामले के अनुसार कथित घटना के समय एस साव की उम्र करीब 17 वर्ष थी। वह 12 जनवरी 2026 से हिरासत में था। उसके खिलाफ लोहरसिंघना थाना में मामला दर्ज किया गया था। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि नाबालिग पर आरोप केवल इतना था कि उसने एक बोलेरो गाड़ी का शीशा तोड़ा था। उसकी सामाजिक जांच रिपोर्ट में भी कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी। वह 11वीं कक्षा का छात्र था और उसके पिता उसके आचरण की जिम्मेदारी लेने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार थे कि वह जाने-माने अपराधियों के संपर्क में न आए।
सरकार ने जमानत का किया विरोध
राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि नाबालिग अन्य आरोपितों के साथ शामिल था। इस घटना में एक व्यक्ति की मौत हुई थी और दो अन्य घायल हुए। हाई कोर्ट ने पाया कि जेजे बोर्ड और अपीलीय अदालत ने इस आशंका के आधार पर जमानत खारिज की थी कि रिहा होने पर नाबालिग अपराधियों के संपर्क में आ सकता है और उसे नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरा हो सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग को जमानत से तभी वंचित किया जा सकता है, जब उचित आधार मौजूद हों कि उसकी रिहाई से उसका संपर्क किसी ज्ञात अपराधी से हो सकता है, उसे नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरा हो सकता है अथवा न्याय के उद्देश्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।