Ranchi: झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत कहा है कि मेडिकल कॉलेज किसी छात्र से ऐसे पीजी कोर्स का बांड नहीं भरवा सकता, जिसकी मान्यता ही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जब दाखिला ही गलत और भ्रामक आधार पर दिया गया हो तो उससे जुड़ा बांड भी कानूनन प्रभावी नहीं रह जाता।
अदालत ने महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज जमशेदपुर को डॉक्टर से बांड और स्टाइपेंड के रूप में जमा 39 लाख 94 हजार 645 रुपये लौटाने का आदेश दिया। साथ ही मानसिक परेशानी और करियर के महत्वपूर्ण दो साल खराब होने के एवज में डॉक्टर को सात लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।
मामला 2019-21 सत्र में डिप्लोमा इन मेडिकल रेडियो डायग्नोसिस (डीएमआरडी-रेडियोलॉजी) में दाखिले से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, इलाहाबाद से एमबीबीएस किया था।
उसने वर्ष 2019 में नीट-पीजी की परीक्षा पास की। काउंसिलिंग के बाद उसे एमजीएम मेडिकल कॉलेज जमशेदपुर में डीएमआरडी-रेडियोलॉजी की सीट मिली। उसने यह सीट स्वीकार कर ली और पहले से मिली सीट छोड़कर एमजीएम में दाखिला ले लिया।
दाखिले के समय कॉलेज ने उससे एक बांड भरवाया था। इसके तहत पढ़ाई बीच में छोड़ने पर 30 लाख रुपये देने के साथ स्टाइपेंड की राशि लौटाने की शर्त थी। कॉलेज ने उसके मूल प्रमाणपत्र भी अपने पास रख लिए।
न कोर्स मान्य था, न रेडियोलॉजी में पर्याप्त व्यवस्था
याचिकाकर्ता के अनुसार, कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उसे पता चला कि रेडियोलॉजी विभाग में पर्याप्त शिक्षक और मार्गदर्शन की व्यवस्था नहीं है। बाद में उसे यह भी जानकारी मिली कि जिस डीएमआरडी-रेडियोलॉजी पाठ्यक्रम में उसका दाखिला हुआ है, उसे तत्कालीन मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की मान्यता प्राप्त नहीं है।
इसके बाद उसने आईएनआई-सीईटी परीक्षा दी और चयन होने पर एमजीएम कॉलेज से अपने मूल प्रमाणपत्र वापस मांगे, लेकिन कॉलेज ने दस्तावेज नहीं लौटाए। इस कारण वह चयन के बावजूद वहां दाखिला नहीं ले सका। बाद में उसने नीट-पीजी 2021 में फिर परीक्षा दी और ऑल इंडिया रैंक 270 हासिल कर संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, लखनऊ में दाखिला लिया।
दाखिला ही गलत तो बांड का कोई कानूनी आधार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि छात्र को कोर्स की गैर-मान्यता के बारे में पहले जानकारी थी या नहीं, यह मुद्दा महत्वपूर्ण नहीं है। अदालत ने कहा कि गैर-मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम को कॉलेज को पेश ही नहीं करना चाहिए था और उसमें किसी छात्र का दाखिला भी नहीं लिया जाना चाहिए था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बांड दाखिले से जुड़ा होता है और दाखिला मान्य पाठ्यक्रम में होना चाहिए। जब दाखिला ही धोखे के आधार पर हुआ हो तो उससे जुड़ा बांड भी कानूनन प्रभावी नहीं हो सकता।
एमआरआई तक नहीं था, सीटी स्कैन भी खराब
अदालत ने मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था पर भी कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि यह हैरानी की बात है कि रेडियोलॉजी में पीजी डिप्लोमा कोर्स चलाने वाले कॉलेज के पास एमआरआई मशीन तक नहीं थी।
वहीं, उपलब्ध सीटी स्कैन मशीन भी काम नहीं कर रही थी। कोर्ट ने कहा कि पीजी कोर्स के लिए जरूरी उपकरणों और सुविधाओं की उपलब्धता के बारे में महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना दाखिला लेने वाले छात्रों के साथ धोखे के समान है।
एमसीआई की भूमिका पर भी उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने तत्कालीन मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में एमसीआई ने कॉलेज के खिलाफ उचित कार्रवाई क्यों नहीं की। कोर्ट ने टिप्पणी की कि नियामक संस्था ने भविष्य के चिकित्सकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से आंखें मूंद लीं और जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की।
अदालत ने काउंसिलिंग कराने वाली संस्था को भी जिम्मेदार माना। कोर्ट ने कहा कि जब पाठ्यक्रम मान्यता प्राप्त नहीं था तो काउंसिलिंग में उस कॉलेज और पाठ्यक्रम की अनुशंसा कैसे की गई।
दो साल का करियर हुआ प्रभावित
अदालत ने कहा कि इन गलतियों के लिए छात्र को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कॉलेज छोड़ने और दोबारा नीट-पीजी परीक्षा देने के कारण उसके करियर के दो महत्वपूर्ण वर्ष प्रभावित हुए।
कोर्ट ने कहा कि नीट-पीजी में 270 रैंक हासिल करने वाले डॉक्टर के भविष्य के साथ संस्थानों की कार्रवाई ने खिलवाड़ किया। हाईकोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए कॉलेज को 39,94,645 रुपये लौटाने और डॉक्टर को सात लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।

