Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल दोस्ताना लेन-देन को कानूनी रूप से वसूले जाने योग्य कर्ज नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने दो आरोपियों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए शिकायतकर्ता की अपील खारिज कर दी। जस्टिस राजेश शंकर की अदालत जमशेदपुर के न्यायिक दंडाधिकारी के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। शिकायतकर्ता का दावा था कि उसने 3 जनवरी 2007 को आरोपी को कारोबार में मदद के लिए दो लाख रुपये का फ्रेंडली लोन दिया था। इसमें एक लाख रुपये चेक और एक लाख रुपये नकद दिए गए थे। आरोप था कि सुरक्षा के तौर पर आरोपी ने डेढ़ लाख और 50 हजार रुपये के दो पोस्ट-डेटेड चेक दिए, जो बाद में खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण बाउंस हो गए। इसके बाद एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत मामला दर्ज कराया गया।
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने खुद को गवाह के रूप में पेश करते हुए कहा कि आरोपी ने स्वयं उसके नाम से चेक लिखकर दिए थे। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि एनआई एक्ट की धारा 138 मुख्य रूप से व्यावसायिक लेन-देन से जुड़े मामलों के लिए बनाई गई है। अदालत ने माना कि चेक धारक के पक्ष में कानूनी अनुमान जरूर होता है, लेकिन यदि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह दिखाते हैं कि कोई कानूनी रूप से लागू करने योग्य कर्ज नहीं था, तो यह अनुमान खत्म हो जाता है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि “दोस्ती किसी अनुबंध का आधार या प्रतिफल नहीं हो सकती।” यदि कोई वैध अनुबंध नहीं है, तो ऐसे लेन-देन को कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता और वह वसूले जाने योग्य ऋण की श्रेणी में नहीं आएगा। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने खुद इस रकम को फ्रेंडली लोन बताया था। ऐसे में ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

