Ranchi News (HC News): झारखंड हाई कोर्ट ने कैदी अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई की मांग को अस्वीकार करने वाली राज्य सजा समीक्षा बोर्ड की अधिसूचना संख्या 1262 दिनांक 25.03.2026 को रद्द कर दिया है।
न्यायमूर्ति रोंगन मुखोपाध्याय की अदालत ने मामले को राज्य सजा समीक्षा बोर्ड को फिर से विचार के लिए वापस भेज दिया है और कहा है कि बोर्ड अगली बैठक में विस्तृत और तर्कसंगत आदेश पारित करे।
मामला क्या है?
अनिल शर्मा पुत्र श्री नंदेश प्रसाद शर्मा ने रांची के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में साथी कैदी सुधीर सिंह उर्फ भोमा की हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद समयपूर्व रिहाई के लिए रिट याचिका (डब्ल्यू.पी. (सीआर.) संख्या 307/2026) दायर की थी।
घटना लोअर बाजार पुलिस स्टेशन केस संख्या 12/99 से संबंधित है। सत्र विचारण संख्या 443/99 में 22.03.2002 को अनिल शर्मा को धारा 302/34 और 307/34 भारतीय दंड संहिता के तहत दोषी ठहराया गया और मृत्युदंड की सजा सुनाई गई।
अपील में झारखंड हाईकोर्ट ने 29.11.2002 को दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने 30.04.2004 को अपील खारिज कर दी।
याचिकाकर्ता का पक्ष
वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने 26 वर्ष से अधिक की वास्तविक हिरासत और 29 वर्ष से अधिक की हिरासत (परिहार सहित) पूरी कर ली है।
उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का मामला बिहार की 1984 की समयपूर्व रिहाई नीति (ज्ञापन संख्या 1647 दिनांक 24.02.1984) से नियंत्रित होता है, जो उस समय लागू थी जब उसे दोषी ठहराया गया था। इस नीति के तहत 14 वर्ष की वास्तविक हिरासत और 20 वर्ष की हिरासत (परिहार सहित) पूरी करने पर समयपूर्व रिहाई अनिवार्य है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि झारखंड की 2007 की नीति को भी लागू माना जाए तो उसके तहत भी 25 वर्ष की अधिकतम अवधि (परिहार सहित) पूरी हो चुकी है, इसलिए याचिकाकर्ता किसी भी स्थिति में रिहाई का हकदार है। याचिकाकर्ता की आयु 65 वर्ष से अधिक है और वह विभिन्न बीमारियों से पीड़ित है तथा एम्स में कोरोनरी आर्टरी बाईपास ग्राफ्टिंग करा चुका है।
हाई कोर्ट में राज्य का पक्ष
राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता के सहायक अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता एक गैंगस्टर है जिसने जेल में साथी कैदी की हत्या की।
समयपूर्व रिहाई पर विचार करने की शक्ति राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के पास है और 14 वर्ष की वास्तविक हिरासत तथा 20 वर्ष की हिरासत पूरी कर लेना स्वतः रिहाई का आधार नहीं बनता। राज्य ने कहा कि 1984 की नीति अप्रासंगिक है क्योंकि झारखंड राज्य ने 2003, 2007, 2011 और 2013 में नई अधिसूचनाएं जारी की हैं।
न्यायालय की टिप्पणियां
न्यायालय ने पाया कि प्रस्तुत अधिसूचना दिनांक 25.03.2026 में याचिकाकर्ता की समयपूर्व रिहाई की मांग को निम्न आधारों पर अस्वीकार किया गया:
1. याचिकाकर्ता ने जेल के अंदर एक अन्य कैदी की हत्या की
2. रिहाई होने पर गैंगवॉर और सार्वजनिक शांति भंग होने की प्रबल संभावना है
3. याचिकाकर्ता पूर्व में न्यायिक हिरासत से भागा था
न्यायालय ने कहा कि इन आधारों में जेल अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक, परिवीक्षा अधिकारी और संबंधित विद्वान अदालत की राय का केवल सामान्य उल्लेख है, लेकिन यह नहीं बताया गया कि परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट के विपरीत गैंगवॉर की संभावना कैसे बनी हुई है।
न्यायालय ने कहा कि सभी अस्वीकृति आदेशों में एक समान विषय दोहराया गया है, जो मन के गंभीर अनुप्रयोग की कमी दर्शाता है। ये आदेश एक ढांचागत सूत्र में ढाले गए हैं जो परिस्थितियों की परवाह किए बिना समयपूर्व रिहाई की मांग को अस्वीकार करने के लिए तैयार किए गए प्रतीत होते हैं।
न्यायालय ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ने न्यायिक हिरासत से भागने के मामले में आपराधिक अपील संख्या 184/2010 में 25.02.2014 को बरी कर दिया गया था। परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता के अपराध दोहराने की प्रवृत्ति काफी हद तक कम हो गई है, उसका सामाजिक-आर्थिक स्तर अच्छा है और पैरोल के दौरान उसका आचरण संतोषजनक रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला
न्यायालय ने स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम जगदीश (2010) 4 एससीसी 216 का हवाला देते हुए कहा कि समयपूर्व रिहाई के लिए विचार करते समय यह देखा जाना चाहिए कि क्या अपराध समाज पर प्रभाव डाले बिना व्यक्तिगत कृत्य था, अपराध दोहराने की कोई संभावना है या नहीं, कैदी ने अपराध करने की क्षमता खो दी है या नहीं, कैदी को और अधिक कैद करने का कोई सार्थक उद्देश्य है या नहीं, और कैदी के परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है।
न्यायालय ने रोहित चतुर्वेदी बनाम उत्तराखंड राज्य (2026 एससीसी ऑनलाइन एससी 865) का भी हवाला दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि परिहार (रेमिशन) सजा प्रक्रिया का विस्तार नहीं है, बल्कि एक अलग कार्यकारी कार्य है जो वर्तमान और भविष्य से संबंधित है – कैदी का आचरण, सुधार के साक्ष्य और समाज में पुनर्वास की संभावनाएं। केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर परिहार से इंकार नहीं किया जा सकता।
न्यायालय का निर्णय
न्यायालय ने पाया कि प्रस्तुत अधिसूचना दिनांक 25.03.2026 याचिकाकर्ता के संबंध में लगभग पूर्व की अधिसूचनाओं की शब्दशः प्रतिलिपि है। यह आदेश यांत्रिक तरीके से पारित किया गया प्रतीत होता है क्योंकि इसमें न तो उन रिपोर्टों पर चर्चा की गई है जो अस्वीकृति का आधार बनीं और न ही रिपोर्टों का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है।
तदनुसार, न्यायालय ने अधिसूचना दिनांक 25.03.2026 को याचिकाकर्ता के संबंध में रद्द कर दिया और मामले को राज्य सजा समीक्षा बोर्ड को समयपूर्व रिहाई की मांग पर नए सिरे से विचार करने के लिए वापस भेज दिया। बोर्ड को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता का मामला अगली बैठक में रखे और इस आदेश तथा सर्वोच्च न्यायालय के रोहित चतुर्वेदी मामले के निर्देशों के आलोक में विस्तृत और तर्कसंगत आदेश पारित करे।

