Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की एकलपीठ ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार के अधिकारियों की प्रशासनिक लापरवाही या गलती के कारण यदि किसी कर्मचारी की प्रोन्नति समय पर नहीं हो पाती है, तो उसे उस अवधि के वास्तविक वित्तीय लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने याचिकाकर्ता मनोज कुमार सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें 1 अक्टूबर 2012 से ‘सहायक अनुभाग पदाधिकारी’ (ASO) के पद पर वास्तविक वित्तीय लाभ देने का स्पष्ट निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि अनुभाग पदाधिकारी (Section Officer) के पद पर मनोज कुमार सिंह की प्रोन्नति तिथि 24 सितंबर 2025 की जगह संशोधित कर 4 दिसंबर 2020 तय की जाए और इसके लिए आवश्यक संशोधन अधिसूचना जारी की जाए।
क्या था पूरा मामला?
1997 में नियुक्ति: प्रार्थी मनोज कुमार सिंह की नियुक्ति वर्ष 1997 में राज्य सरकार के तृतीय श्रेणी (लिपिकीय संवर्ग) के तहत हुई थी।
वरीयता सूची से नाम छूटा: वर्ष 2012 में वे ‘सहायक अनुभाग पदाधिकारी’ पद पर प्रोन्नति के लिए पूरी तरह पात्र थे। हालांकि, विभागीय अधिकारियों की गलती के कारण उनका नाम वरीयता सूची (Seniority List) में शामिल होने से छूट गया।
जूनियर कर्मियों को मिला लाभ: 1 अक्टूबर 2012 को मनोज कुमार सिंह से कनिष्ठ (जूनियर) कर्मचारियों को तो प्रोन्नति दे दी गई, लेकिन प्रार्थी इस लाभ से वंचित रह गए।
केवल काल्पनिक प्रोन्नति (Notional Promotion): बाद में विभागीय गलती में सुधार करते हुए 20 सितंबर 2024 के एक विभागीय आदेश के ज़रिए उन्हें 1 अक्टूबर 2012 के प्रभाव से सहायक अनुभाग पदाधिकारी के पद पर काल्पनिक प्रोन्नति तो दी गई, लेकिन इस अवधि के वास्तविक वित्तीय व वेतन लाभ देने से साफ मना कर दिया गया।
अदालत की सख्त टिप्पणी और निर्देश
विभागीय आदेश और वित्तीय लाभ न मिलने के खिलाफ मनोज कुमार सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि प्रोन्नति मिलने में हुई वर्षों की देरी के लिए कर्मचारी खुद कहीं से भी जिम्मेदार नहीं था। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने कहा कि जब त्रुटि पूर्ण रूप से विभाग और अधिकारियों के स्तर पर हुई है, तो उसकी सजा कर्मचारी को नहीं दी जा सकती। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि प्रार्थी को 1 अक्टूबर 2012 से सहायक अनुभाग पदाधिकारी पद का पूरा बकाया और वास्तविक वित्तीय लाभ प्रदान किया जाए।
अन्य कर्मचारियों के लिए भी नजीर बना यह फैसला
हाईकोर्ट का यह आदेश राज्य सरकार के उन तमाम कर्मचारियों के लिए एक बड़ी नजीर साबित होगा, जिन्हें प्रशासनिक लालफीताशाही या विभागीय भूल-चूक के कारण समय पर प्रोन्नति का लाभ नहीं मिल पाता है और बाद में उन्हें केवल कागजी/काल्पनिक (Notional) प्रोन्नति देकर टाल दिया जाता है।

