– झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने सुनाया आदेश – अदालत ने कहा: सिर्फ आधी सजा काटने के आधार पर जघन्य अपराधों में नहीं दी जा सकती जमानत, मेरिट पर पहले ही हो चुका है फैसला
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म के प्रयास और उसकी गला घोंटकर हत्या करने के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषी धानों टुडू की सजा स्थगित कर जमानत पर रिहा करने की याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल 10 साल से अधिक की सजा काट लेने को जघन्य अपराधों में जमानत का मुख्य आधार नहीं बनाया जा सकता। यह याचिका क्रिमिनल अपील के तहत दायर की गई थी, जिसमें मुसाबनी (पूर्वी सिंहभूम) थाना कांड संख्या XX/2015 से जुड़े स्पेशल पॉक्सो केस (Spl. POCSO Case No. XXX/2015) के सजायाफ्ता अपीलकर्ता नंबर 2 धानों टुडू ने सजा स्थगित करने की गुहार लगाई थी।
क्या था मामला?
मामला 19 नवंबर 2015 का है, जब पूर्वी सिंहभूम जिले के मुसाबनी थाना क्षेत्र स्थित तिलाबनी गांव में करमा पूजा के दौरान आरोपी छोटका गोप और धानों टुडू ने बहला-फुसलाकर एक नाबालिग लड़की का अपहरण कर लिया था। अगली सुबह गांव की झाड़ियों में बच्ची का शव मिला, जिसके गले में पतली रस्सी लिपटी हुई थी। जमशेदपुर की स्पेशल पॉक्सो अदालत ने 25 फरवरी 2020 को धानों टुडू और उसके साथी को धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास व ₹20,000 जुर्माना, तथा धारा 376D/511 (गैंगरेप का प्रयास) के तहत 10 वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
अपीलकर्ता (बचाव पक्ष) की दलीलें
अपीलकर्ता के अधिवक्ता मनोज कुमार दश ने तर्क दिया कि:
आवेदक/दोषी धानों टुडू लगभग साढ़े 10 साल (10½ वर्ष) की जेल काट चुका है, जो उसकी आजीवन कारावास की सजा का एक बड़ा हिस्सा है।
पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न या वीर्य के कोई साक्ष्य (Semen traces) नहीं मिले हैं।
इतनी लंबी अवधि जेल में बिताने के बाद न्याय के हित में उसे जमानत दी जानी चाहिए।
राज्य सरकार (अभियोजन पक्ष) का विरोध
राज्य सरकार की ओर से अपर लोक अभियोजक (APP) विश्वनाथ राय ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि:
हाईकोर्ट पूर्व में ही 2 नवंबर 2023 को (I.A. No. 9475/2023) गुण-दोष (Merits) के आधार पर आवेदक की सजा स्थगन याचिका खारिज कर चुका है।
पीड़िता की छोटी बहन (PW-6) इस बात की चश्मदीद गवाह है कि दोनों आरोपी ही पीड़िता को अपने साथ ले गए थे।
पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के तहत आरोपियों पर ही अपराध न करने को साबित करने का वैधानिक भार (Statutory Presumption) होता है, जिसमें वे विफल रहे हैं।
हाईकोर्ट का फैसला और मुख्य कानूनी बिंदु:
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने आदेश सुनाते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदु रेखांकित किए:
सजा की अवधि एकमात्र आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों (State of Haryana vs. Hasmat एवं Shivani Tyagi vs. State of U.P.) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि हत्या और पॉक्सो जैसे गंभीर अपराधों में महज 10 या 10½ साल जेल में बिता देना सजा स्थगित करने का आधार नहीं बन सकता।
आदेश की समीक्षा (Review) संभव नहीं: कोर्ट ने पाया कि गुण-दोष पर 2 नवंबर 2023 को दिए गए आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती दिए बिना, उन्हीं पुराने तर्कों (यौन हमले के साक्ष्य न होना) पर दोबारा विचार करना अपने ही आदेश की समीक्षा करने जैसा होगा, जो कानूनन उचित नहीं है।
कोई नया आधार नहीं: जब तक याचिकाकर्ता के पास कोई नया और मजबूत आधार (Fresh Ground) न हो, तब तक खारिज हो चुकी याचिका को दोबारा मंजूर नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने अंतरिम आवेदन (I.A. No. 12632/2026) को खारिज करते हुए जेल अधीक्षक के माध्यम से आदेश की प्रति अपीलकर्ता को भेजने का निर्देश दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि इन टिप्पणियों का प्रभाव मुख्य आपराधिक अपील के अंतिम फैसले पर नहीं पड़ेगा।

