अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा—जो आरोपी खुद शर्त मानकर अग्रिम जमानत का लाभ ले चुका है, वह अब अपनी बात से पीछे नहीं हट सकता; चार साल तक फरार रहने के बाद दाखिल की गई थी याचिका।
मुख्य बातें (Key Highlights):
मामला: SBI कॉमर्शियल ब्रांच में बैंक जालसाजी और अवैध लोन वितरण से जुड़ा सीबीआई जांच मामला।
आरोपी: मुरारी प्रसाद बर्णवाल (तत्कालीन असिस्टेंट मैनेजर, SBI कॉमर्शियल ब्रांच, रांची व बोकारो)।
अदालत का निर्णय: झारखंड उच्च न्यायालय ने आरोपी की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने अग्रिम जमानत के लिए निचली अदालत (सिविल कोर्ट) में 10 लाख रुपये जमा करने की शर्त को हटाने का अनुरोध किया था।
Ranchi News: झारखंड उच्च न्यायालय ने बैंक जालसाजी के एक गंभीर मामले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की कॉमर्शियल ब्रांच के तत्कालीन अधिकारी मुरारी प्रसाद बर्णवाल को तगड़ा झटका दिया है। अदालत ने आरोपी की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अग्रिम जमानत के लिए सिविल कोर्ट में 10 लाख रुपये जमा करने की शर्त को वापस लेने या हटाने का आग्रह किया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब आरोपी ने खुद स्वेच्छा से अदालत के समक्ष 10 लाख रुपये जमा करने का आश्वासन दिया था और उसके आधार पर जमानत प्राप्त की थी, तो अब वह अपने वचन से मुकर नहीं सकता।
क्या है पूरा मामला और वित्तीय अनियमितता के आरोप?
सीबीआई (CBI) इस बैंक जालसाजी के मामले की जांच कर रही है। आरोपी मुरारी प्रसाद बर्णवाल नवंबर 2003 से मई 2006 तक एसबीआई की रांची कॉमर्शियल ब्रांच में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर तैनात था। इसके पश्चात, जून 2006 से अक्तूबर 2007 तक वह बोकारो स्थित कॉमर्शियल ब्रांच में पदस्थापित रहा।
जांच के दौरान यह आरोप लगाया गया कि अपने कार्यकाल के दौरान उसने विवेक प्रताप सिंह की कंपनी मेसर्स रेणुकरा पॉलिसैक्स प्राइवेट लिमिटेड को बैंकिंग नियमों के विरुद्ध जाकर भारी-भरकम कर्ज दिया और नियमों को ताक पर रखकर उसकी ऋण सीमा (Credit Limit) भी बढ़ा दी। सनसनीखेज पहलू यह है कि इस पूरी जालसाजी में शामिल बैंक अधिकारियों ने कथित तौर पर सरकारी जमीन तक को बैंक के पास गिरवी रखवा दिया था।
जमानत की शर्त और चार साल की फरारी:
मामले की जांच सीबीआई को सौंपे जाने के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए मुरारी प्रसाद ने झारखंड हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान उसने खुद अदालत के समक्ष वचन दिया था कि वह जमानत के एवज में सिविल कोर्ट के रजिस्ट्रार के पास 10 लाख रुपये जमा करा देगा। उसके इसी आश्वासन पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने वर्ष 2021 में उसे अग्रिम जमानत दे दी थी और चार महीने के भीतर राशि जमा करने का निर्देश दिया था।
समयसीमा का उल्लंघन: आरोपी ने न तो निर्धारित अवधि में 10 लाख रुपये जमा किए और न ही अदालत में सरेंडर किया।
अतिरिक्त समय का दुरुपयोग: इसके बाद वर्ष 2022 में उसने पुनः हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और राशि जमा करने के लिए अतिरिक्त समय का अनुरोध किया। अदालत ने नरमी बरतते हुए उसे 6 महीने का और वक्त दिया, लेकिन इस अवधि में भी उसने पैसे जमा नहीं किए और फरार बना रहा।
वर्ष 2026 में तीसरी बार पहुँचा हाईकोर्ट:
करीब चार साल तक कानून की नजरों से बचकर फरार रहने के बाद, आरोपी ने वर्ष 2026 में तीसरी बार हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। इस बार उसका नया पैंतरा यह था कि अग्रिम जमानत के साथ जुड़ी 10 लाख रुपये जमा करने की अनिवार्य शर्त को ही पूरी तरह से वापस ले लिया जाए या रद्द कर दिया जाए।
अदालत का अंतिम आदेश:
हाईकोर्ट ने आरोपी के इस रुख को गंभीरता से लेते हुए उसकी मांग को पूरी तरह अनुचित करार दिया। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि न्यायिक प्रक्रिया और अपने ही वसों का इस प्रकार बार-बार उल्लंघन करने वाले आरोपी को कोई राहत नहीं दी जा सकती। इसके साथ ही, अदालत ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया।

