Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने करीब साढ़े चार साल की मासूम बच्ची की अंतरिम कस्टडी उसकी मां को सौंपने का महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में माता-पिता के व्यक्तिगत अधिकारों की तुलना में बच्चे का कल्याण और उसका सर्वोत्तम हित (Child Welfare) सबसे सर्वोपरि होता है। यह आदेश जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने दिया।
फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द यह आदेश पी कुमारी (बदला हुआ नाम) की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति की पीठ ने सुनाया। हाईकोर्ट ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट द्वारा 27 नवंबर 2025 को पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत मां की अंतरिम कस्टडी की अर्जी खारिज कर दी गई थी और उसे केवल बच्ची से मिलने (विजिटेशन राइट्स) का अधिकार दिया गया था। हाईकोर्ट ने अब पिता (सी कुमार – बदला हुआ नाम) को सप्ताहांत (Weekends) में बच्ची से मिलने की अनुमति दी है।
आईवीएफ से हुआ था बच्ची का जन्म मामले के अनुसार, दोनों पक्ष विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। दोनों की यह दूसरी शादी 16 मई 2017 को हुई थी और आईवीएफ (IVF) प्रक्रिया के जरिए 8 मार्च 2022 को बेटी का जन्म हुआ था। वैवाहिक विवाद बढ़ने पर मां ने आरोप लगाया कि जब बच्ची महज सवा दो साल (2 साल 3 महीने) की थी, तब पिता ने उसे जबर्दस्ती अपने पास रख लिया और मां से मिलने नहीं दिया। दूसरी ओर, पिता का तर्क था कि बच्ची जनवरी 2023 से उसके और दादा-दादी के साथ हजारीबाग में रह रही है और वहीं प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ाई कर रही है।
हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां:
कानूनी प्रावधान का उल्लंघन: ‘गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890’ की धारा 12 के तहत फैमिली कोर्ट को अंतरिम कस्टडी पर स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए था, लेकिन उसने इस मुख्य मुद्दे को छोड़ केवल मुलाकात का अधिकार दिया।
5 साल से कम उम्र में मां का अधिकार: ‘हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956’ की धारा 6(a) के तहत 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे की कस्टडी सामान्यतः मां के पास ही रहनी चाहिए।
फैमिली कोर्ट का आदेश त्रुटिपूर्ण: हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को विकृत (Perverse) और कानून के प्रतिकूल मानते हुए कहा कि निचली अदालत ने तथ्यों और वैधानिक प्रावधानों का सही मूल्यांकन नहीं किया।

