New Delhi/Ranchi: सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड और बिहार में अदालती प्रक्रियाओं के गलत इस्तेमाल पर कड़ी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कंप्लेन केस में केवल समन जारी होने से आरोपी को गिरफ्तारी का भय नहीं होना चाहिए और ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत के लिए निचली अदालत या हाईकोर्ट जाने की जरूरत नहीं है। जस्टिस जे.पी. पारदिवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ झारखंड हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए आरोपी को ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत लेने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि यह कानून की गलत व्याख्या है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब मजिस्ट्रेट किसी शिकायत पर संज्ञान लेकर समन जारी करता है, तब पुलिस को आरोपी को गिरफ्तार करने का कोई अधिकार नहीं होता। गिरफ्तारी केवल तभी संभव है, जब अदालत समन के साथ गैर-जमानती वारंट जारी करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट यदि अग्रिम जमानत याचिका खारिज करना चाहें तो कर सकते हैं, लेकिन आरोपी को आत्मसमर्पण करने का आदेश देना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।अदालत ने धारा 202 सीआरपीसी का उल्लेख करते हुए कहा कि इस प्रावधान के तहत पुलिस जांच के दौरान भी गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। इसे गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटि बताते हुए कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति बिहार और झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए और संबंधित मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। यह मामला ओम प्रकाश छावनिका की याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने हाईकोर्ट के सरेंडर के आदेश को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन माना जा रहा है।

