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JSSC New Rules: सिर्फ राज्य के संस्थानों से 10-12वीं पास होनेवाले ही नियुक्ति योग्य, संशोधित नियमावली पर एक दिसंबर को सुनवाई करेगा हाईकोर्ट

Devesh Ananad
By Devesh Ananad On 27 Nov, 2021
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Ranchi: JSSC New Rules झारखंड कर्मचारी चयन आयोग परीक्षा (स्नातक परीक्षा संचालन संशोधन नियमावली)-2021 को चुनौती देने वाली याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है। प्रार्थी की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार ने अदालत से विशेष सुनवाई का आग्रह किया था, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

प्रार्थी कुशल कुमार व रमेश हांसदा की ओर से इसको लेकर हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। इसमें राज्य के संस्थानों से दसवीं और प्लस टू योग्यता वाले अभ्यर्थियों को ही परीक्षा में शामिल होने की अनिवार्यता रखी गई है। याचिका में कहा गया है कि नई नियमावली में राज्य के संस्थानों से ही दसवीं और प्लस टू की परीक्षा पास करने की अनिवार्य किया जाना संविधान की मूल भावना और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

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वैसे अभ्यर्थी जो राज्य का निवासी होते हुए भी राज्य के बाहर से पढ़ाई किए हों, उन्हें नियुक्ति परीक्षा से नहीं रोका जा सकता है। नई नियमावली में संशोधन कर क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं की श्रेणी से हिंदी और अंग्रेजी को बाहर कर दिया गया है, जबकि उर्दू, बांग्ला और उड़िया को रखा गया है। याचिका में उर्दू को जनजातीय भाषा की श्रेणी में रखने पर भी आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ता ने नई नियमावली में निहित दोनों प्रविधानों को निरस्त करने का आग्रह किया है।

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मेयर के अधिकारों में कटौती पर हाईकोर्ट में तीन दिसंबर को सुनवाई
नगर पालिका के अध्यक्ष और नगर निगम के मेयरों के अधिकारों में कटौती के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। इस पर सुनवाई के लिए अदालत से विशेष आग्रह किया गया। अदालत इस मामले की सुनवाई के लिए तैयार है और तीन दिसंबर को मामले में सुनवाई की तिथि निर्धारित की है।

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तीन नवंबर को प्रार्थी संजय कुमार की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि महाधिवक्ता की ओर से की गई गलत व्याख्या को कानून के रूप में मान्यता देते हुए राज्य सरकार ऐसा निर्देश जारी नहीं कर सकती है, जिसमें मेयर के अधिकार को कम किया जा सके। महाधिवक्ता की ओर से नगरपालिका अधिनियम एवं संविधान में निहित प्रविधानों की अनदेखी एवं गलत व्याख्या की गई है।

इस वजह से मेयर का अधिकार नगण्य हो गया है और एजेंडा व बैठक की तिथियों को निर्धारित करने का अधिकार अब मेयर की बजाय नगर आयुक्त अथवा सीईओ को दे दिया गया है। प्रार्थी की ओर से कहा गया है कि महाधिवक्ता का मंतव्य संविधान एवं नगरपालिका अधिनियम के ठीक विपरीत है। इसलिए राज्य सरकार के उक्त आदेश को निरस्त कर देना चाहिए।

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देवेश आनंद को पत्रकारिता जगत का 15 सालों का अनुभव है। इन्होंने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान में काम किया है। अब वह इस वेबसाइट से जुड़े हैं।

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