खूंटी के चिरीबेरा में जमीन विवाद को लेकर हुई थी खूनी झड़प, तीन लोगों की गई थी जान; जौर पहान को हत्या के प्रयास में 10 साल की सजा भी बरकरार, मिली 13 को उम्र कैद, सात की हो गई मौत
Ranchi News: खूंटी के चिरीबेरा में जमीन विवाद को लेकर हुए तिहरे हत्याकांड में झारखंड हाईकोर्ट ने छह दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। अदालत ने दोषियों की ओर से दायर अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। साथ ही जौर पहान को हत्या के प्रयास के मामले में सुनाई गई 10 साल की सजा भी बरकरार रखी है। अदालत ने दोषियों के जमानत बांड रद्द करते हुए उन्हें निचली अदालत में आत्मसमर्पण कर सजा भुगतने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने 14 अक्टूबर 2026 को क्रिमिनल अपील (डीबी) संख्या 195/1998 पर फैसला सुनाया। यह मामला खूंटी थाना कांड संख्या 8/1991 से जुड़ा है। निचली अदालत ने 25 जुलाई 1998 को दोषियों को दोषी करार दिया था और 28 जुलाई 1998 को सजा सुनाई थी।
4.91 एकड़ जमीन को लेकर हुआ था विवाद
अभियोजन के अनुसार, एक फरवरी 1991 की सुबह जिकी गांव के गोबर्धन सिंह मानकी और उनके परिवार के लोग चिरीबेरा स्थित खेत में जुताई कर रहे थे। इसी दौरान सोले गांव के कई लोग फरसा, बलुआ, टांगी, लाठी और धनुष-बाण लेकर वहां पहुंचे। खेत पर मालिकाना हक को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद हुआ। आरोप है कि इसके बाद आरोपियों ने खेत में मौजूद लोगों पर हमला कर दिया।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, सिधु पहान और लखन पहान ने मंगल सिंह मानकी पर फरसा से हमला किया। वहीं, सदु पहान, करम सिंह मुंडा और बुधुआ मुंडा ने हरिनाथ मानकी पर हमला किया। दोनों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। हमले में हेमराज सिंह मानकी और चिंतामणि मानकी भी गंभीर रूप से घायल हुए। चिंतामणि को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन कुछ दिनों बाद उनकी भी मौत हो गई।
घायल गवाह और चश्मदीदों की गवाही को माना अहम
हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि घायल गवाह हेमराज सिंह मानकी की गवाही को चिकित्सकीय साक्ष्य का समर्थन मिला। डॉक्टर ने उनकी चोटों के अलावा मृतकों मंगल सिंह मानकी और हरिनाथ मानकी के शरीर पर धारदार हथियार से लगी गंभीर चोटों की पुष्टि की थी। अदालत ने सूचक गोबर्धन सिंह मानकी, करम सिंह मानकी, हेमराज सिंह मानकी और कुंज बिहारी मानकी की गवाही पर विचार किया। अदालत के अनुसार, इन गवाहों ने हमले और आरोपियों की भूमिका के बारे में बयान दिए, जिनकी पुष्टि मेडिकल साक्ष्य से भी हुई।
अदालत ने माना कि आरोपियों ने हथियारों से लैस होकर समूह में हमला किया और हत्या के साझा उद्देश्य से वारदात को अंजाम दिया। इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 302/149 के तहत उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखने का आधार मौजूद है। जांच अधिकारी की गवाही नहीं होने की दलील भी अदालत ने स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही और घटनास्थल से संबंधित दस्तावेजों से घटना की जगह स्पष्ट रूप से साबित होती है।
छह आरोपियों की सजा बरकरार, सात की अपील पहले ही समाप्त
इस मामले में शुरू में 13 आरोपियों ने अपील दायर की थी। अपील लंबित रहने के दौरान सात आरोपियों की मौत हो गई, इसलिए उनके संबंध में अपील की कार्यवाही समाप्त कर दी गई। शेष छह अपीलकर्ताओं—करम सिंह मुंडा, रिदा पहान, बुधुआ मुंडा, महादेव मुंडा, सिधु पहान और जौर पहान—के मामले में हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी।
अदालत ने सभी छह दोषियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 148 और धारा 302/149 के तहत मिली उम्रकैद की सजा कायम रखी। जौर पहान को धारा 307/34 के तहत मिली 10 साल की सजा भी बरकरार रखी गई। अपील खारिज होने के बाद सभी छह दोषियों के जमानत बांड रद्द कर दिए गए हैं। अदालत ने उन्हें निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। आत्मसमर्पण नहीं करने पर निचली अदालत को उनकी हिरासत सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है।………

