Ranchi News: झारखंड उच्च न्यायालय ने मनरेगा योजना के तहत ट्यूबवेल निर्माण के नाम पर 3.11 लाख रुपये से अधिक की राशि के कथित गबन और अनियमितता के मामले में आरोपित तत्कालीन ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर (BPO) सुष्मिता प्रिया उर्फ सुष्मिता गुप्ता को तगड़ा झटका दिया है। अदालत ने उनकी डिस्चार्ज पिटीशन (उन्मोचन याचिका) को खारिज करते हुए निचली अदालत के उस आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है, जिसमें उनके खिलाफ आरोप तय किए जाने का आधार माना गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए निचली अदालत के आदेश में दखल देने का कोई न्यायसंगत कारण नहीं बनता है।
मामले की पृष्ठभूमि और जांच का दायरा:
मांडर थाना से जुड़ा मामला: यह पूरा मामला रांची जिले के मांडर थाना क्षेत्र से संबंधित है।
गबन का खुलासा: उप विकास आयुक्त (DDC) कार्यालय के 3 जनवरी 2018 के पत्र के आधार पर जब मामले की जांच कराई गई, तो यह बात सामने आई कि मनरेगा योजना के तहत जलेश्वर लोहरा के नाम पर ट्यूबवेल निर्माण के लिए 3,11,000 रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत की गई थी। आरोप था कि जमीन पर बिना कोई निर्धारित कार्य किए ही मिलीभगत कर पूरी राशि का गबन कर लिया गया है। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने अदालत में चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल की थी, जिसके आधार पर निचली अदालत ने संज्ञान लिया था।
बचाव पक्ष की दलीलें और अदालत का रुख:
संविदा पर कार्य करने का तर्क: आरोपित सुष्मिता प्रिया की ओर से अदालत को बताया गया कि वह मार्च 2010 से सितंबर 2012 तक संविदा (Contract) पर ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर के रूप में कार्यरत थीं। वित्तीय वर्ष 2010-11 के दौरान उक्त लाभुक को मनरेगा योजना के तहत ट्यूबवेल स्वीकृत किया गया था।
स्थल निरीक्षण और वसूली का दावा: बचाव पक्ष ने दलील दी कि 19 अक्टूबर 2016 को हुए संयुक्त स्थल निरीक्षण के दौरान यह बात सामने आई थी कि ट्यूबवेल निर्धारित भूमि के बजाय किसी अन्य व्यक्ति की जमीन पर बना दिया गया है। इसके बाद संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों से राशि की रिकवरी (वसूली) के लिए कार्यालय आदेश भी जारी किया गया था।
हालांकि, तमाम दलीलों और साक्ष्यों का मुआयना करने के बाद उच्च न्यायालय ने माना कि इस मामले में प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्रियां उपलब्ध हैं, जिसके आधार पर निचली अदालत की कार्यवाही आगे बढ़ सकती है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पूर्व BPO की याचिका खारिज कर दी।

