Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने आर्म्स एक्ट के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि महज हथियार या कारतूस की बरामदगी से आर्म्स एक्ट की धारा 26(1) के तहत दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। इस धारा के तहत यह साबित करना जरूरी है कि हथियार या गोला-बारूद को इस तरह गुप्त रूप से रखा गया था कि सरकारी कर्मचारी को इसकी जानकारी न हो। जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने नारायण यादव उर्फ ककला की धारा 26(1) के तहत हुई दोषसिद्धि रद्द कर दी।
मामला वर्ष 2000 का है। 2 अक्तूबर की रात कुंडा पुलिस को सूचना मिली थी कि कुछ अपराधी डकैती की तैयारी कर रहे हैं। पुलिस ने करनिजोर पुल के पास छापेमारी कर नारायण यादव समेत कुछ लोगों को पकड़ा था। तलाशी के दौरान नारायण के पास से .315 बोर के दो जिंदा कारतूस बरामद हुए थे। इसी मामले में ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2005 में उसे आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-बी)(ए) और 26(1) के तहत दोषी ठहराते हुए क्रमश: एक और दो साल की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि नारायण के पास से दो जिंदा कारतूस की बरामदगी से धारा 25(1-बी)(ए) का अपराध साबित होता है, इसलिए इस हिस्से की दोषसिद्धि बरकरार रहेगी। हालांकि, सामान्य तलाशी और जब्ती के दौरान कारतूस मिलने को धारा 26(1) में बताए गए ‘गुप्त उल्लंघन’ के तौर पर नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि घटना को 26 साल बीत चुके हैं और आरोपी करीब चार महीने जेल में रह चुका है। लंबी मुकदमेबाजी को देखते हुए धारा 25(1-बी)(ए) में दी गई एक साल की सजा को पहले से भुगती गई करीब चार महीने की अवधि तक सीमित कर दिया गया। अपील को दोषसिद्धि और सजा में इस संशोधन के साथ निष्पादित किया गया। आरोपी पहले से जमानत पर था, इसलिए उसका बेल बॉन्ड भी समाप्त कर दिया गया।

