Ranchi: झारखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी तलाकशुदा पत्नी से हलाला के बाद दोबारा शादी करने से इनकार करता है, तो यह इनकार अपने आप में कोई संज्ञेय अपराध या कानूनी गलती नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आधार पर पत्नी पूर्व पति को दोबारा शादी के लिए बाध्य नहीं कर सकती और न ही कोई नया आपराधिक मुकदमा दर्ज करा सकती है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने यह आदेश इमरान हुसैन की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। मामला धनवार (घोरथम्बा ओ.पी.) थाना के मामला संख्या 314/2025 से जुड़ा है, जो शिकायत मामला संख्या 684/2025 से उत्पन्न हुआ था।
इसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 की विभिन्न धाराओं, दहेज प्रतिषेध अधिनियम और मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
पहले भी दर्ज हो चुका था मामला
अदालत में पेश याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह पूर्व में महिला का पति था और इसी तरह के आरोपों को लेकर महिला ने वर्ष 2020 में धनवार थाना मामला संख्या 405/2020 दर्ज कराया था, जिसे बाद में समझौते के आधार पर निपटा दिया गया।
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि पत्नी उसे कम पैसे देने और आलीशान जीवन नहीं दे पाने को लेकर प्रताड़ित करती थी। अदालत को यह भी बताया गया कि तलाक हो चुका है और महिला ने किसी अन्य व्यक्ति से शादी कर ली है।
अदालत ने क्यों दी अग्रिम जमानत?
कोर्ट ने कहा कि जब तलाक हो चुका है और महिला ने दूसरी शादी कर ली है, तो पति के दोबारा शादी से इनकार करने पर नया मामला दर्ज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि दस्तावेजों में ऐसी कोई कानूनी धारा नहीं है, जिसके तहत पत्नी केवल पति के इनकार के आधार पर उसे दोबारा शादी के लिए मजबूर कर सके या नया मुकदमा दर्ज करा सके।
जमानत की शर्तें
हाईकोर्ट ने पति इमरान हुसैन को तीन सप्ताह के भीतर निचली अदालत में समर्पण करने का निर्देश दिया है। समर्पण या गिरफ्तारी की स्थिति में उन्हें 25,000 रुपये के जमानती बांड और इतनी ही राशि के दो जमानतदारों के आधार पर जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया है।

