Ranchi News: रांची स्थित अपर न्यायायुक्त-5 की अदालत ने मध्यस्थता (Mediation) के दौरान तय हुई शर्तों का पालन न करने के आधार पर दायर जमानत रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामलों में दी गई जमानत को वित्तीय समझौते की वसूली या नागरिक देनदारी लागू कराने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। मामला सदर थाना कांड संख्या 394/2025 से जुड़ा है। याचिकाकर्ता विकास कुमार ने अपने अधिवक्ता राजन सहाय के माध्यम से आपराधिक विविध याचिका दाखिल कर आरोपी राजीव रंजन की अग्रिम जमानत रद्द करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उसने जमीन खरीदने के लिए राजीव रंजन को पैसे दिए थे। इसके बाद नागरिक अदालत रांची के मध्यस्थता केंद्र में 21 जनवरी 2026 को दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ। समझौते के तहत आरोपी राजीव रंजन को पूरे पैसे की वसूली होने तक ₹1 लाख प्रति माह का भुगतान करना था। इस समझौते के आधार पर ही अदालत ने 28 जनवरी 2026 को आरोपी को अग्रिम जमानत दी थी। लेकिन जमानत मिलने के बाद आरोपी ने केवल एक-दो किस्तें दीं और फिर भुगतान बंद कर दिया। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता की अर्जी का एकमात्र आधार मध्यस्थता की शर्तों का पालन न होना था, जो कानून की नज़र में सही नहीं है। अतः अदालत ने इस याचिका को पूरी तरह से निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।
आरोपी पक्ष की सफाई
आरोपी राजीव रंजन के अधिवक्ता विवेक कुमार आर्य ने अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि मध्यस्थता के तहत प्रति माह ₹1 लाख का भुगतान तय हुआ था। हालांकि, उन्होंने तर्क दिया कि खराब वित्तीय स्थिति के कारण कुछ किस्तें चूक गईं। उन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि आरोपी का इरादा पैसे लौटाने का है और इसके लिए उसे कुछ और समय दिया जाना चाहिए।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और कानूनी आधार
मामले की सुनवाई के बाद न्यायाधीश शैलेन्द्र कुमार की अदालत ने अपने आदेश में प्रमुख कानूनी बिंदुओं को रेखांकित किया:
- जमानत रद्द करने के नियम: अदालत ने कहा कि जमानत या अग्रिम जमानत आपराधिक कानून के मेरिट (जैसे अपराध की प्रकृति या भागने के जोखिम) के आधार पर दी जाती है। इसे किसी वित्तीय या नागरिक समझौते (Civil Settlement) को लागू कराने का हथियार नहीं बनाया जा सकता।
- जमानत रद्द होने के वैध कारण: जमानत केवल मामलों से जुड़े गंभीर दुराचार पर रद्द की जा सकती है—जैसे साक्ष्यों से छेड़छाड़ करना, गवाहों को धमकाना, अदालत के अधिकार क्षेत्र से भागना या नया अपराध करने की संभावना होना।
- उच्च न्यायालयों के नजीर/फैसले:
- सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court): “बीमन चटर्जी बनाम संचिता चटर्जी (2004)” मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि समझौते की शर्तों का पालन न करना जमानत रद्द करने या देने का आधार नहीं हो सकता।
- झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court): “शिव नारायण यादव बनाम झारखंड राज्य (2024)” मामले में भी यही व्यवस्था दी गई है कि समझौते का उल्लंघन जमानत रद्द करने का कारण नहीं बन सकता।
- मध्यस्थता अधिनियम, 2023 (Mediation Act, 2023): अदालत ने अधिनियम की धारा 22 का उल्लेख करते हुए कहा कि मध्यस्थता की कार्यवाही पूरी तरह गोपनीय होती है। इसके तहत दी गई जानकारी, बयानों या दस्तावेजों को किसी भी अदालत में साक्ष्य (Evidence) के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

