Ranchi News: सिविल कोर्ट रांची के न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा की अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी महिला की प्राकृतिक या चिकित्सीय बांझपन को छिपाने मात्र से आपराधिक मामला नहीं बनता। अदालत ने इस टिप्पणी के साथ शिकायतकर्ता बिरेंद्र मोहन मिश्रा की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और निचली अदालत द्वारा शिकायत केस खारिज करने के आदेश को बरकरार रखा। मामला वर्ष 2022 में हुई शादी से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद उनकी पत्नी वैवाहिक जीवन में रुचि नहीं ले रही थीं। बाद में इलाज के दौरान डॉक्टर ने बताया कि पत्नी को स्त्री रोग संबंधी समस्या है, जिसके कारण गर्भधारण संभव नहीं हो पा रहा। शिकायतकर्ता का आरोप था कि लड़की पक्ष को इस बीमारी की जानकारी पहले से थी, लेकिन विवाह से पूर्व इसे जानबूझकर छिपाया गया। इसी आधार पर धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश, धमकी और अन्य धाराओं में कंप्लेन केस दायर किया गया था।
हालांकि निचली अदालत ने नवंबर 2025 में शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य नहीं है, जिससे प्रथमदृष्टया आपराधिक मामला बनता हो। इसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने रिवीजन याचिका दाखिल की थी। सुनवाई के दौरान न्यायिक आयुक्त ने कहा कि किसी महिला या उसके परिवार के लिए विवाह से पहले यह निश्चित रूप से जान पाना संभव नहीं होता कि वह भविष्य में गर्भधारण कर पाएगी या नहीं। अदालत ने यह भी कहा कि प्राकृतिक बांझपन या चिकित्सीय समस्या व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं होती और इसे स्वतः धोखाधड़ी या आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में तलब करना गंभीर विषय है। केवल आरोप लगाने भर से आपराधिक कानून लागू नहीं किया जा सकता। अदालत को पहले यह संतुष्ट होना जरूरी है कि रिकॉर्ड पर पर्याप्त प्रथमदृष्टया साक्ष्य मौजूद हैं। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप मुख्य रूप से वैवाहिक और चिकित्सीय विवाद से जुड़े हैं, जिनमें कोई स्पष्ट आपराधिक तत्व नहीं दिखता। इसी आधार पर अदालत ने रिवीजन याचिका खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया।

