Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने झारखंड प्रशासनिक सेवा (JAS) के अधिकारी राधेश्याम प्रसाद की याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार द्वारा उनकी वरिष्ठता (Seniority) को घटाने के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि आपसी सहमति से कैडर स्थानांतरण (Mutual Cadre Allocation) के मूल आदेश में वरिष्ठता खोने की कोई शर्त नहीं थी, तो सरकार बाद में इसे पिछली तारीख से (Retrospectively) लागू करके किसी कर्मचारी को डिमोट नहीं कर सकती।
क्या है पूरा मामला?
बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत बिहार और झारखंड के बीच सरकारी कर्मचारियों के कैडर का बंटवारा किया गया था।
- पारस्परिक स्थानांतरण: याचिकाकर्ता राधेश्याम प्रसाद और एक अन्य कर्मचारी मंजू प्रसाद ने आपसी सहमति से बिहार से झारखंड और झारखंड से बिहार कैडर के लिए संयुक्त आवेदन दिया था।
- शर्त रहित आवंटन: दोनों राज्य सरकारों की सहमति के बाद, 21 जून 2006 (Memo No. 5890) को याचिकाकर्ता को झारखंड कैडर आवंटित किया गया। इस मूल आदेश में यह कहीं भी नहीं लिखा था कि उन्हें अपनी बैच की वरिष्ठता गंवानी होगी।
- वरिष्ठता और पदोन्नति: इसके बाद, झारखंड सरकार ने उन्हें सामान्य वरिष्ठता सूची में क्रॉन्क 835-B पर रखते हुए वर्ष 2011, 2016 और 2023 में संयुक्त सचिव के पद तक पदोन्नतियां भी दीं।
विवाद की शुरुआत
झारखंड सरकार ने बाद में (19 जुलाई 2008 को) एक नीतिगत निर्णय लिया कि आपसी तबादले पर आने वाले कर्मचारियों को उनके बैच में सबसे नीचे (Junior-most) रखा जाएगा। इसी आदेश का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने 23 सितंबर 2024 को एक नया पत्र जारी किया और याचिकाकर्ता की वरिष्ठता को क्रॉन्क 835-B से घटाकर 877-D (यानी बैच में सबसे नीचे) कर दिया। सरकार ने इसके लिए हाईकोर्ट के ‘रविंद्र प्रसाद सिंह’ मामले के एक पुराने आदेश का सहारा लिया था।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और कानूनी बिंदु
जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निम्नलिखित मुख्य बातें कहीं:
- पिछली तारीख से शर्तें थोपना अवैध: अदालत ने कहा कि जब 2006 में याचिकाकर्ता का कैडर ट्रांसफर हुआ, तब दोनों राज्यों के बीच ऐसी कोई शर्त नहीं थी कि वे अपनी वरिष्ठता खो देंगे। सरकार अपने 2008 के नीतिगत फैसले को 2006 के मामलों पर पिछली तारीख से लागू नहीं कर सकती।
- रविंद्र प्रसाद सिंह मामले से भिन्नता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘राज्य बनाम रविंद्र प्रसाद सिंह’ मामले में ट्रांसफर आदेश जारी होने के समय ही वरिष्ठता खोने की शर्त बकायदा लिखित रूप में जोड़ी गई थी, इसलिए वह मामला अलग था। याचिकाकर्ता का मामला ‘राजेंद्र प्रताप सिन्हा’ मामले के समान है, जहां कोई शर्त नहीं लगाई गई थी।
- अधिनियम की धारा 73 का उल्लंघन: बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 की धारा 73 के तहत, केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी कर्मचारी की सेवा शर्तों में ऐसा कोई बदलाव नहीं किया जा सकता जो उसके लिए नुकसानदेह (To his disadvantage) हो।
कोर्ट का अंतिम आदेश
- हाईकोर्ट ने झारखंड सरकार द्वारा जारी 23 सितंबर 2024 के आदेश और 16 दिसंबर 2024 को जारी अंतिम वरिष्ठता सूची (जहां याचिकाकर्ता को नीचे धकेला गया था) को पूरी तरह से निरस्त (Quash) कर दिया है।
- अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि राधेश्याम प्रसाद की मूल वरिष्ठता (क्रॉन्क 835-B) को सभी परिणामी लाभों (Consequential Benefits) के साथ बहाल किया जाए।

