“भले ही कर्मचारी जांच में शामिल न हुआ हो, फिर भी उसे जांच रिपोर्ट सौंपना और शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करना अनिवार्य; केवल दस्तावेजों के आधार पर दोषसिद्धि गलत” — झारखंड हाईकोर्ट
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पुलिस विभाग को बड़ा झटका देते हुए एक सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ पारित डिसिप्लिनरी अथॉरिटी के सजा के आदेश को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा है. मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनाक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी विभागीय कार्यवाही (DepartmentaI Proceeding) में आरोपी कर्मचारी को जांच रिपोर्ट (Inquiry Report) की प्रति और दूसरा कारण बताओ नोटिस देना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि प्राकृतिक न्याय का अनिवार्य हिस्सा है. इसके अभाव में दी गई कोई भी बड़ी सजा कानूनी रूप से टिक नहीं सकती.
रिश्वतखोरी के आरोपों से जुड़ा था मामला
मामला वर्ष 2010 का है, जब याचिकाकर्ता उमेश कुमार सिंह चाईबासा के मुफस्सिल थाने के प्रभारी थे. उस दौरान पुलिस ने सात ट्रकों को जब्त किया था, जिसके रिलीज की रिपोर्ट कोर्ट में भेजने के लिए केस के जांच अधिकारी (IO) द्वारा ₹10,000 की रिश्वत मांगने का आरोप लगा था. शिकायतकर्ता का आरोप था कि थाना प्रभारी की सहमति से यह रकम मांगी गई थी. इसके बाद विभाग ने उमेश कुमार सिंह के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर उनकी एक वार्षिक वेतन वृद्धि रोक दी थी (दो ब्लैक मार्क के बराबर).
सरकार की दलील: ‘कर्मचारी खुद जांच से भागा, तो नोटिस कैसा?’
एकल पीठ द्वारा सजा रद्द किए जाने के खिलाफ राज्य सरकार और पुलिस महानिदेशक (DGP) ने एलपीए (L.P.A.) दायर की थी. सरकारी वकील की मुख्य दलील यह थी कि सब-इंस्पेक्टर को जांच अधिकारी ने अपनी बात रखने के कई मौके दिए थे, लेकिन वे जानबूझकर जांच कार्यवाही में शामिल नहीं हुए. ऐसे में जब कर्मचारी खुद प्रक्रिया से दूर रहा, तो उसे जांच रिपोर्ट न सौंपने से कोई नुकसान (Prejudice) नहीं पहुंचा और न ही किसी प्रक्रियात्मक खामी का सवाल उठता है.
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियां और कानूनी रुख:
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों (ईसीआईएल बनाम बी. करुणाकर और रूप सिंह नेगी बनाम पंजाब नेशनल बैंक) का हवाला देते हुए सरकार की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया और निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रेखांकित किए:
- शिकायतकर्ता का बयान न होना गंभीर चूक: अदालत ने पाया कि पूरी विभागीय जांच में न तो शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया गया और न ही किसी गवाह का क्रॉस-एग्जामिनेशन हुआ. केवल पुलिस केस के कागजातों के आधार पर किसी को दोषी मान लेना पूरी तरह गलत है. आरोपी के उपस्थित न रहने पर भी शिकायतकर्ता का परीक्षण करना जांच अधिकारी का कर्तव्य था.
- जांच रिपोर्ट क्यों है जरूरी?: खंडपीठ ने कहा कि जांच रिपोर्ट की कॉपी मिलने के बाद ही कर्मचारी यह समझ पाता है कि उसके खिलाफ निष्कर्ष किसी सबूत के आधार पर निकाले गए हैं या बिना किसी आधार के. इसके बिना वह डिसिप्लिनरी अथॉरिटी के सामने अपना पक्ष रख ही नहीं सकता.
- रिटायरमेंट के बाद दोबारा जांच संभव नहीं: चूंकि रिट याचिकाकर्ता वर्ष 2022 में ही अपनी सेवा से सेवानिवृत्त (Retire) हो चुके हैं, इसलिए अदालत ने माना कि एकल पीठ का मामले को दोबारा सुनवाई के लिए विभाग के पास न भेजना बिल्कुल उचित था.
अदालत का अंतिम आदेश:
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने माना कि सब-इनस्पेक्टर के खिलाफ की गई पूरी विभागीय कार्यवाही में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाई गईं. अदालत ने राज्य सरकार की अपील को पूरी तरह से मेरिट-विहीन (Devoid of merit) पाते हुए खारिज कर दिया और पीड़ित सेवानिवृत्त कर्मचारी को सभी परिणामी लाभ (Consequential benefits) देने के आदेश को सही ठहराया.

