भूमि अधिकारों की रक्षा और अवैध हस्तांतरण पर उच्च न्यायालय का कड़ा रुख
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने संथाल परगना टेनेंसी (सप्लीमेंट्री प्रोविज़न) एक्ट, 1949 (SPT Act) के तहत भूमि विवाद और ‘कुर्फानामा’ (जमीन समझौता दस्तावेज) की कानूनी प्रामाणिकता को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि संथाल परगना क्षेत्र में जनजातीय और स्थानीय रैयतों के भूमि अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है। यदि कोई गैर-रैयत या कब्जाधारी कानून लागू होने की तिथि (1 नवंबर 1949) से पहले जमीन पर 12 वर्षों का निर्बाध और वैध कब्जा साबित नहीं कर पाता, तो उसे अतिक्रमणकारी मानकर बेदखल करने का आदेश पूरी तरह से वैध है। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने गोड्डा निवासी याचिकाकर्ता बेनी माधव झा की रिट याचिका [W.P.(C) No. 3922 of 2012] को सिरे से खारिज कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद गोड्डा जिले के दुमरिया मौजा के प्लॉट संख्या 640 और 641 (क्षेत्रफल 1 बीघा 10 कट्ठा) से जुड़ा है:
- शुरुआती आदेश: प्रतिवादी नरेंद्र झा ने खुद को मूल रैयत टेटरू झा का दत्तक पुत्र बताते हुए याचिकाकर्ता के पिता के खिलाफ बेदखली का मुकदमा किया था। 1979 में अनुमंडल पदाधिकारी (SDO), गोड्डा ने बेदखली का आदेश दिया।
- आयुक्त का फैसला: उपायुक्त (DC) द्वारा इस आदेश को पलटने के बाद मामला प्रमंडलीय आयुक्त, दुमका की रिविजनल कोर्ट में गया। आयुक्त ने 21 अक्टूबर 2011 को उपायुक्त के आदेश को रद्द कर SDO के बेदखली के फैसले को बहाल रखा, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
‘सादा कुर्फानामा’ पर अदालत की कानूनी व्याख्या
याचिकाकर्ता का दावा था कि उनके पिता ने साल 1941 में टेटरू झा से ‘कुर्फानामा’ के जरिए यह जमीन ली थी और वे तब से लगातार इस पर काबिज हैं। अदालत ने तस्दीक नियमावली (Tasdik Niyamawali) का हवाला देते हुए सादे कुर्फानामा की वैधता के लिए तीन अनिवार्य शर्तें रेखांकित कीं:
- वह पंजीकृत (Registered) होना चाहिए।
- यदि सादा है, तो किसी अदालत द्वारा उसकी तारीख और प्रामाणिकता को मान्यता दी गई हो।
- या फिर उसे किसी सक्षम अदालत में प्रदर्श (Exhibit) के रूप में स्वीकार किया गया हो।
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का दस्तावेज इनमें से किसी भी शर्त को पूरा नहीं करता, इसलिए यह कानून की नजर में संदिग्ध और मिलीभगत (Collusive) से तैयार किया गया प्रतीत होता है।
12 वर्ष की अवधि का गणित और कोर्ट का निष्कर्ष
न्यायालय ने गणना करते हुए कहा कि चूंकि एसपीटी एक्ट 1 नवंबर 1949 को प्रभावी हुआ और याचिकाकर्ता का कुर्फानामा 1941 का है, इसलिए कानून लागू होने के समय उनका कब्जा केवल 8 वर्ष का ही था, न कि अनिवार्य 12 वर्ष का। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के पुराने दृष्टांतों का हवाला देते हुए कहा कि संथाल परगना में शक्तिशाली ग्रामीण समुदाय के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए रैयती भूमि के किसी भी प्रकार के छिपे या अवैध हस्तांतरण को नियमित नहीं किया जा सकता। चूंकि याचिकाकर्ता कानूनन अपना प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) साबित करने में विफल रहे, इसलिए प्रमंडलीय आयुक्त द्वारा दिए गए बेदखली के आदेश में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

