Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने राजधानी रांची के पॉश इलाके मोरहाबादी में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) की धारा 71A से जुड़े 23 साल पुराने भूमि विवाद में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने निचली अदालतों (SAR कोर्ट, उपायुक्त और प्रमंडलीय आयुक्त) के फैसलों को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं की रिट याचिकाओं को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। Justice अनुभा रावत चौधरी की एकल पीठ ने W.P.(C) No. 332 of 2003 (डॉ. एच.पी. नारायण) एवं W.P.(C) No. 557 of 2003 (श्रीमती वीणा नारायण) पर सुनवाई के बाद फैसला सुनाते हुए आदिवासी रैयत की जमीन वापस (Restoration) करने के आदेश को यथावत रखा है।
📌 मामला क्या है?
विवाद रांची के बरियातू थाना अंतर्गत मोराबादी स्थित खाता संख्या 77, प्लॉट संख्या 1123 की 1.22 एकड़ जमीन से जुड़ा है।
- आदिवासी पक्ष का दावा:जमीन के मूल खतियानी रैयत भूवा उरांव और मुसमात बुधनी थे। 9 दिसंबर 1940 को उन्होंने यह जमीन रजिस्टर्ड केवला (बिक्री पत्र) के जरिए हरिहर उरांव को बेच दी थी। हरिहर उरांव के पुत्र बैजनाथ उरांव की मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण उनकी पत्नी कुआरी टोप्पो (उत्तरवादी संख्या 5) ने 1983 में SAR कोर्ट में धारा 71A के तहत जमीन बहाली का आवेदन दिया था। उनका आरोप था कि उनके पति की बीमारी का फायदा उठाकर 1976-80 के दौरान उन्हें बेदखल कर दिया गया था।
- गैर-आदिवासी क्रेताओं (याचिकाकर्ताओं) का पक्ष:याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मूल रैयत ने 1943 में जमीन जमींदार को सरेंडर कर दी थी। जमींदार ने 14 मार्च 1943 को सदा हुकुमनामा के जरिए शेख रहमान अली को छप्परबंदी (गैर-कृषि/आवासीय) बन्दोबस्ती दी थी। बाद में शेख रहमान अली ने 1979 में यह जमीन डॉ. एच.पी. नारायण और उनकी पत्नी वीणा नारायण को बेच दी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जमीन छप्परबंदी हो चुकी है, इसलिए सीएनटी एक्ट लागू नहीं होता और 40 साल बाद दाखिल की गई बहाली याचिका समय-सीमा (Limitation) से बाधित है।
⚖️ हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां एवं निष्कर्ष
न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद याचिकाकर्ताओं के दोनों मुख्य तर्कों को खारिज कर दिया:
- 1. छप्परबंदी का दावा साबित नहीं हुआ:अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई खतियान या आधिकारिक रिकॉर्ड-ऑफ-राइट्स पेश नहीं कर सके, जिससे यह साबित हो कि जमीन का स्वरूप ‘छप्परबंदी’ में बदल चुका था। 1940 में रजिस्टर्ड केवला के जरिए हस्तांतरित हो चुकी जमीन को 1943 में ‘सदा हुकुमनामा’ से सरेंडर और छप्परबंदी बनाना कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है। मात्र राजस्व रसीद या अंचल अधिकारी की रिपोर्ट से जमीन का मूल स्वरूप नहीं बदलता।
- 2. परिसीमा (Limitation) का तर्क बेबुनियाद:कोर्ट ने पाया कि पीड़ित आदिवासी परिवार को 1976-1980 के दौरान बैजनाथ उरांव की मानसिक अस्वस्थता का लाभ उठाकर बेदखल किया गया था। बेदखली के 8 वर्षों के भीतर (1983 में) ही 71A की याचिका दाखिल की गई थी, इसलिए यह मामला समय से बाधित (Time-barred) नहीं है।
- 3. सिविल कोर्ट का पूर्व निर्णय:अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि टाइटल सूट संख्या 151/72 और टाइटल अपील 117/77 में सिविल कोर्ट पहले ही 1940 के रजिस्टर्ड डीड के आधार पर बैजनाथ उरांव के अधिकार और स्वामित्व की पुष्टि कर चुका है।
📝 कोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने माना कि SAR कोर्ट, उपायुक्त और प्रमंडलीय आयुक्त तीनों राजस्व प्राधिकरणों के फैसलों में कोई प्रक्रियात्मक या कानूनी त्रुटि नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदिवासियों की जमीन को हड़पने के लिए सरेंडर और सदा हुकुमनामा की कहानी गढ़ी गई थी। अदालत ने दोनों रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए निचली अदालतों द्वारा कुआरी टोप्पो और उनके उत्तराधिकारियों के पक्ष में पारित जमीन बहाली (Restoration) के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है।

