बोला- जमानत या बरी होना हिरासत खत्म करने का आधार नहीं, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई जरूरी
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन पीएलएफआई के सक्रिय सदस्य बताए गए महावीर गोप उर्फ महाबीर गोप की निरोधात्मक हिरासत को वैध ठहराते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने खूंटी के उपायुक्त द्वारा झारखंड अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2002 की धारा 12(2) के तहत 21 अक्तूबर 2025 को पारित निरोधात्मक हिरासत के आदेश, गृह विभाग द्वारा 5 दिसंबर 2025 को उसकी पुष्टि तथा 9 जनवरी और 10 अप्रैल 2026 को हिरासत अवधि बढ़ाने के आदेशों में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता पीएलएफआई का सक्रिय सदस्य है और उसके खिलाफ लेवी वसूली, संगठित अपराध, हथियार रखने तथा आपराधिक षड्यंत्र जैसे गंभीर आरोपों वाले कई मामले दर्ज हैं। उपलब्ध सामग्री से यह भी स्पष्ट होता है कि उसकी गतिविधियां केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा हैं। ऐसे में निरोधात्मक हिरासत का आदेश पूरी तरह न्यायसंगत और विधिसम्मत है।
सुनवाई के दौरान महावीर गोप की ओर से दलील दी गई कि उसके खिलाफ दर्ज चार मामलों में से दो में वह बरी हो चुका है तथा शेष दो मामलों में हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है। इसलिए केवल लंबित मामलों के आधार पर निरोधात्मक हिरासत का आदेश जारी नहीं किया जा सकता। यह भी कहा गया कि सामान्य आपराधिक कानून पर्याप्त था और सरकार चाहती तो जमानत रद्द कराने की कार्रवाई कर सकती थी। इसके अलावा आरोप लगाया गया कि जेल प्रशासन ने उसका प्रतिवेदन सरकार तक नहीं भेजा और उसे अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया गया। राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि महावीर गोप प्रतिबंधित पीएलएफआई संगठन का सक्रिय सदस्य है और व्यवसायियों व ठेकेदारों से लेवी वसूलने, हथियारबंद गिरोह चलाने तथा क्षेत्र में भय का माहौल बनाने में उसकी भूमिका रही है। पुलिस की रिपोर्ट और उपलब्ध आपराधिक रिकॉर्ड के आधार पर उपायुक्त ने निरोधात्मक हिरासत का आदेश पारित किया था, जिसकी समय-सीमा के भीतर राज्य सरकार ने पुष्टि भी कर दी। बाद में कानून के अनुसार हिरासत की अवधि भी बढ़ाई गई।
खंडपीठ ने जेल प्रशासन के खिलाफ लगाए गए आरोपों को भी स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका कि उसका प्रतिवेदन जानबूझकर सरकार तक नहीं भेजा गया। केवल आरोप लगाने से दुर्भावना सिद्ध नहीं होती। अदालत ने कहा कि किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ दुर्भावना का आरोप साबित करने के लिए मजबूत और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी आरोपी का जमानत पर होना या कुछ मामलों में बरी हो जाना अपने आप में निरोधात्मक हिरासत समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता। यदि सक्षम प्राधिकारी उपलब्ध तथ्यों और आपराधिक गतिविधियों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि संबंधित व्यक्ति की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा हैं और सामान्य कानून से उन पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है, तो निरोधात्मक हिरासत का आदेश पारित किया जा सकता है।
खंडपीठ ने कहा कि महावीर गोप के खिलाफ दर्ज मामलों की प्रकृति, अपराधों की निरंतरता और पीएलएफआई से उसके कथित संबंधों को देखते हुए उपायुक्त ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर संतोष दर्ज किया था। यह संतोष कानून के अनुरूप है और इसमें किसी प्रकार की मनमानी नहीं दिखती। अदालत ने माना कि निरोधात्मक हिरासत का उद्देश्य भविष्य में सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों को रोकना है, न कि किसी पुराने अपराध के लिए दंड देना। इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने महावीर गोप की याचिका खारिज करते हुए 21 अक्तूबर 2025 के निरोधात्मक हिरासत आदेश, 5 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार द्वारा की गई पुष्टि तथा 9 जनवरी और 10 अप्रैल 2026 को अवधि विस्तार के आदेशों को वैध ठहराया। साथ ही लंबित अंतरिम आवेदन भी निष्पादित कर दिए।

