हाई कोर्ट की दोटूक- “सीजेएम कोर्ट ने संतुष्टि के बाद ही जारी किया प्रोक्लेमेशन, आदेश में कोई अवैधता नहीं”
Ranchi News: झारखंड हाई कोर्ट ने धनबाद के एक कारोबारी को अदालत द्वारा भगोड़ा घोषित करने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए धनबाद निवासी कारोबारी आशीष कुमार की आपराधिक याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब निचली अदालत ने केस डायरी और पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संतुष्ट होकर आदेश जारी किया है, तो उसमें किसी भी तरह का कानूनी हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला और किस आदेश को दी गई थी चुनौती?
यह पूरा मामला धनबाद थाना कांड संख्या 162/2024 से जुड़ा है। कारोबारी आशीष कुमार के खिलाफ आईपीसी (IPC) की गंभीर धाराओं 406 (अमानत में ख्यानत), 420 (धोखाधड़ी), 467, 468 और 471 (जालसाजी और फर्जी दस्तावेज तैयार करना) के तहत मामला दर्ज है। इस मामले में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM), धनबाद की अदालत ने 17 मार्च 2026 को एक आदेश पारित किया था। इस आदेश के तहत आरोपी के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 82 के तहत भगोड़ा घोषित करने के लिए उद्घोषणा (Proclamation Order) जारी की गई थी। इसी आदेश को रद्द कराने के लिए याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ता की दलील: “बिना सोचे-समझे जारी हुआ आदेश”
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता आशीष कुमार की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि धनबाद के सीजेएम ने बिना उचित कानूनी विचार किए और यांत्रिक तरीके (Mechanical Manner) से यह आदेश पारित कर दिया। इसके अलावा यह भी दलील दी गई कि उद्घोषणा की जो प्रक्रिया कानून के तहत तय है, उसका पालन नहीं किया गया और इसे निर्धारित समय सीमा के भीतर आरोपी के घर या सार्वजनिक स्थान पर चस्पा और प्रकाशित नहीं किया गया।
सरकार का पक्ष: “गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार फरार है आरोपी”
वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से कोर्ट में पुरजोर दलील दी गई कि पुलिस ने आरोपी आशीष कुमार को गिरफ्तार करने के लिए उसके ठिकानों पर कई बार छापेमारी और प्रयास किए, लेकिन वह हर बार घर से गायब मिला। पुलिस की केस डायरी और जांच रिपोर्ट के आधार पर ही निचली अदालत इस ठोस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि आरोपी जानबूझकर कानून और गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार चल रहा है, जिसके बाद ही यह उद्घोषणा जारी की गई।
हाई कोर्ट का फैसला: “बाद की त्रुटियों से मूल आदेश अवैध नहीं होता”
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद झारखंड हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देने से साफ मना कर दिया। हाई कोर्ट ने अपने फैसले का मुख्य आधार इन बिंदुओं को बनाया:
- संतुष्टि का कानूनी आधार: कोर्ट ने पाया कि सीजेएम धनबाद ने उपलब्ध साक्ष्यों, केस डायरी और पुलिस रिपोर्ट का विधिसम्मत अध्ययन करने और अपनी न्यायिक संतुष्टि दर्ज करने के बाद ही आदेश पारित किया था।
- क्रियान्वयन की कमियां बाद की बात: हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उद्घोषणा के तामील होने या उसे चस्पा करने में अगर कोई कथित त्रुटि हुई भी है, तो वे बाद की घटनाएं हैं। इसके आधार पर सीजेएम के मूल आदेश को अवैध या गलत नहीं ठहराया जा सकता।
- हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं: अदालत ने माना कि इस मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 (अदालत की अंतर्निहित शक्तियां) के तहत हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता है।

