1968 के ट्रस्ट हस्तांतरण को वैध माना, 1971 से चल रही कानूनी लड़ाई का हुआ अंत
दुमका के ऐतिहासिक संताल मिशन संपत्ति विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने संताल मिशन ऑफ नॉर्दर्न चर्चेज (एसएमएनसी) और ट्रस्ट एसोसिएशन ऑफ नॉर्दर्न इवेंजेलिकल लूथरन चर्च (एनईएलसी) के बीच लगभग 56 वर्षों से चल रहे चर्च संपत्ति विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने एलपीए संख्या 79/1992 और 80/1992 को खारिज करते हुए एकलपीठ के वर्ष 1992 के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि 10 फरवरी 1968 का ट्रस्ट हस्तांतरण दस्तावेज (इंस्ट्रूमेंट ऑफ ट्रांसफर) कानून सम्मत था और उसे अवैध घोषित करने का कोई आधार नहीं बनता।
क्या है पूरा मामला
विवाद की जड़ वर्ष 1880 में स्थापित संताल मिशन ऑफ नॉर्दर्न चर्चेज (एसएमएनसी) से जुड़ी है। मिशन की स्थापना संताल परगना क्षेत्र में शिक्षा, सामाजिक उत्थान और ईसाई मिशनरी कार्य के उद्देश्य से की गई थी। इसके लिए मिशन के नाम पर बड़ी मात्रा में चल एवं अचल संपत्तियां खरीदी गईं और ट्रस्ट बनाया गया। बाद में वर्ष 1956 में ट्रस्ट एसोसिएशन ऑफ नॉर्दर्न इवेंजेलिकल लूथरन चर्च (एनईएलसी) का गठन कंपनी अधिनियम के तहत किया गया। इसके बाद 10 फरवरी 1968 को तत्कालीन ट्रस्टियों ने एक दस्तावेज के जरिए एनईएलसी को नया ट्रस्टी बनाया। इसी हस्तांतरण को लेकर विवाद शुरू हुआ।
1971 में दायर हुए दो अलग-अलग मुकदमे
विवाद बढ़ने पर वर्ष 1971 में दो अलग-अलग टाइटल सूट दाखिल किए गए।
पहले मुकदमे (टाइटल सूट संख्या-5/1971) में कुछ लाभार्थियों ने आरोप लगाया कि ट्रस्टियों ने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए 1968 का हस्तांतरण किया। उन्होंने ट्रस्ट के प्रबंधन के लिए नई योजना बनाने, ट्रस्टियों को हटाने और 1968 के हस्तांतरण को अवैध घोषित करने की मांग की। दूसरी ओर, एनईएलसी ने टाइटल सूट संख्या-11/1971 दायर कर मिशन परिसरों पर अपने अधिकार की घोषणा, कब्जे की पुष्टि तथा विरोधी पक्ष को चर्च परिसरों में हस्तक्षेप से रोकने की मांग की।
ट्रायल कोर्ट ने दिए थे अलग-अलग फैसले
28 जून 1985 को ट्रायल कोर्ट ने पहले मुकदमे में 1968 के ट्रांसफर दस्तावेज को अवैध और प्रभावहीन घोषित कर दिया तथा ट्रस्ट की संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक लगा दी। इसके कुछ महीने बाद 5 फरवरी 1986 को दूसरे मुकदमे में ट्रायल कोर्ट ने एनईएलसी के पक्ष में डिक्री पारित कर दी। इस तरह दोनों मामलों में परस्पर विरोधी निर्णय सामने आए।
1992 में एकलपीठ ने पलटा ट्रायल कोर्ट का फैसला
दोनों फैसलों को चुनौती पटना हाईकोर्ट में दी गई। 30 जून 1992 को एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 1968 के ट्रांसफर को अवैध घोषित करने वाला फैसला रद्द कर दिया और एनईएलसी के पक्ष में पारित डिक्री को बरकरार रखा। बाद में झारखंड राज्य बनने के बाद दोनों लेटर्स पेटेंट अपील (एलपीए) झारखंड हाईकोर्ट स्थानांतरित हो गईं।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
खंडपीठ ने कहा कि वर्ष 1971 में दायर मुकदमा तकनीकी रूप से विचारणीय था, लेकिन सुनवाई के दौरान यह साबित नहीं हो सका कि ट्रस्टियों ने ट्रस्ट का दुरुपयोग किया या न्यासभंग किया। जब ट्रस्ट के कुप्रबंधन का आरोप सिद्ध ही नहीं हुआ तो केवल 1968 के हस्तांतरण दस्तावेज को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने स्वयं ट्रस्टियों को हटाने और नया प्रबंधन बनाने जैसी मुख्य मांगें स्वीकार नहीं की थीं, इसलिए बाद में हस्तांतरण को अवैध घोषित करना कानूनी रूप से उचित नहीं था।
गैर-पक्षकार बनाए जाने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण
अदालत ने माना कि जिस संस्था (एनईएलसी) के पक्ष में हस्तांतरण हुआ था, उसे पहले मुकदमे में प्रतिवादी नहीं बनाया गया था। ऐसे में उसके अधिकारों को प्रभावित करने वाला आदेश पारित नहीं किया जा सकता था। यह भी अपील खारिज करने का एक महत्वपूर्ण आधार बना।
ट्रस्ट और ट्रस्टी पर भी स्पष्ट की कानूनी स्थिति
फैसले में खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट स्वयं कोई विधिक व्यक्ति (लीगल पर्सन) नहीं होता। ट्रस्ट से जुड़े मुकदमे उसके ट्रस्टी ही दायर करते हैं या उनके विरुद्ध दायर किए जाते हैं। कंपनी के रूप में गठित एनईएलसी को ट्रस्टी बनाए जाने पर कानून में कोई रोक नहीं है।
अंतिम आदेश
करीब साढ़े पांच दशक पुराने इस विवाद में झारखंड हाईकोर्ट ने दोनों एलपीए खारिज करते हुए 1992 के एकलपीठ के निर्णय को सही ठहराया। इसके साथ ही 1968 के ट्रस्ट हस्तांतरण की वैधता पर लगी कानूनी चुनौती समाप्त हो गई और एनईएलसी के पक्ष में पूर्व में पारित डिक्री बरकरार रही।

