Ranchi News: झारखंड उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने राज्य सरकार की एक अपील को 311 दिनों की अत्यधिक विलंबता के कारण खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी विभागों की ‘फाइल-पुशी’ और प्रशासनिक लापरवाही को अपील दायर करने में देरी माफ करने के लिए ‘पर्याप्त कारण’ नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही, न्यायालय ने वर्ष 2014 में सेवा से बर्खास्त किए गए डॉ. विजय शंकर नारायण सिंह को राहत प्रदान करते हुए उनकी बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करने वाले एकल न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखा।
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि सरकारी तंत्र की ‘अवैयक्तिक मशीनरी’ और ‘नौकरशाही की पुरानी पद्धति’ के बहाने देरी को माफ नहीं किया जा सकता। पीठ ने फैसले में कहा, “विलंबता की अवधि के नियम सभी पर बाध्यकारी हैं, चाहे वह सरकार हो या उसके अधिकारी।”
क्या है पूरा मामला?
डॉ. विजय शंकर नारायण सिंह, जो हजारीबाग के निवासी हैं, को वर्ष 2014 में झारखंड के स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं कल्याण विभाग द्वारा सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। एकल न्यायाधीश ने 1 अगस्त, 2024 को उनकी याचिका स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया और उन्हें बर्खास्तगी की तारीख से सेवानिवृत्ति तक के सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया
अपील में इतनी देरी क्यों?
राज्य सरकार ने एकल न्यायाधीश के इस फैसले के खिलाफ खंडपीठ (LPA) में अपील दायर की, लेकिन यह अपील निर्धारित अवधि (30 दिन) से 311 दिनों की देरी से दायर की गई। सरकार की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण में कहा गया कि फाइल विभाग के विभिन्न अधिकारियों (अनुभाग अधिकारी, उप सचिव, संयुक्त सचिव, अतिरिक्त सचिव, विधि सलाहकार, महाधिवक्ता कार्यालय) के बीच घूमती रही, जिसके कारण देरी हुई
अदालत ने क्यों नहीं मानी दलील?
उच्च न्यायालय ने इस स्पष्टीकरण को ‘सतही’ और ‘फालतू’ करार देते हुए खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि सरकारी विभागों को अपील दायर करने की समय-सीमा के बारे में पूरी जानकारी थी, फिर भी उन्होंने महीनों तक फाइल को एक डेस्क से दूसरी डेस्क पर घुमाया। अदालत ने यह भी कहा कि 1 अगस्त, 2024 से 9 जनवरी, 2025 के बीच की अवधि के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया, जो सरकारी तंत्र की गंभीर लापरवाही को दर्शाता है
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
अपने आदेश में खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया:
· पोस्टमास्टर जनरल बनाम लिविंग मीडिया (2012) के मामले में कहा गया था कि आधुनिक तकनीक के युग में ‘नौकरशाही की पुरानी पद्धति’ के बहाने विलंबता को माफ नहीं किया जा सकता
· यूनियन ऑफ इंडिया बनाम जहांगीर बायरामजी (2024) में कहा गया कि विलंबता का नियम केवल तकनीकी नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है।
· शिवम्मा बनाम कर्नाटका हाउसिंग बोर्ड (2025) के हालिया फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि ‘प्रशासनिक सुस्ती’ कभी भी विलंबता माफ करने का पर्याप्त कारण नहीं हो सकती।
डॉक्टर को राहत क्यों जरूरी?
न्यायालय ने यह भी कहा कि डॉ. सिंह को एकल न्यायाधीश के फैसले के बाद से ही अपने लाभों के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। पीठ ने कहा, “याचिकाकर्ता को राज्य अधिकारियों की इच्छा पर अनिश्चित काल तक इंतजार नहीं करना चाहिए। यदि सरकारी अधिकारियों के इस रवैये को हल्के में लिया गया, तो यह याचिकाकर्ता को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा और उन्हें अवांछित छूट देने जैसा होगा।”

