भाई से जुड़े मामले की सुनवाई करने पर उठे थे सवाल, कोर्ट ने कहा- ‘डॉक्ट्रिन ऑफ नेसेसिटी’ के तहत फैसला लेना था अनिवार्य
Ranchi News: झारखंड हाई कोर्ट ने लोकायुक्त के पूर्व आदेश को चुनौती देने वाली 13 वर्ष पुरानी याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि लोकायुक्त के खिलाफ लगाया गया पक्षपात (बायसनेस) का आरोप साबित नहीं हुआ है। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने मंगलवार को डब्ल्यूपी (सी) संख्या 656/2013 में यह फैसला सुनाया।
याचिकाकर्ता सत्यदेव राय ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन लोकायुक्त न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अमरेश्वर सहाय ने अपने भाई ज्योति कुमार से संबंधित शिकायत पर स्वयं निर्णय लिया, जबकि उन्हें मामले को किसी अन्य अधिकारी को सौंप देना चाहिए था। याचिका में लोकायुक्त के 30 अप्रैल 2012 के उस आदेश को भी चुनौती दी गई थी, जिसमें सीबीआई या महालेखाकार (एजी) से जांच कराने की मांग ठुकरा दी गई थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि संबंधित मामले में पहले से ही पुलिस जांच चल रही थी और बाद में जांच पूरी भी हो गई थी। अदालत ने कहा कि झारखंड लोकायुक्त अधिनियम की धारा 8 के अनुसार यदि किसी अपराध की जांच पहले से हो रही हो तो लोकायुक्त समानांतर जांच नहीं करा सकते। साथ ही धारा 13(3) के तहत लोकायुक्त केवल राज्य सरकार की एजेंसियों की सहायता ले सकते हैं, केंद्रीय एजेंसियों जैसे सीबीआई या महालेखाकार को जांच का निर्देश देने का अधिकार उन्हें नहीं है।
पक्षपात के आरोप पर अदालत ने कहा कि लोकायुक्त एकल सदस्यीय संस्था है। ऐसे में “डॉक्ट्रिन ऑफ नेसेसिटी” लागू होती है, जिसके तहत यदि निर्णय लेने के लिए कोई अन्य सक्षम प्राधिकारी उपलब्ध नहीं हो तो संबंधित पदाधिकारी को ही निर्णय लेना पड़ता है। अदालत ने माना कि लोकायुक्त ने कानून के अनुरूप आदेश पारित किया था और उनके आदेश से किसी प्रकार का पक्षपात परिलक्षित नहीं होता।
इन निष्कर्षों के आधार पर हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि लोकायुक्त के आदेश में कोई अवैधता नहीं है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं होते।

