Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने सरकारी तंत्र की लेटलतीफी पर सख्त रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि विभागीय फाइलों के आवागमन और प्रशासनिक सुस्ती को अदालत में अपील दायर करने में हुई देरी को माफ करने का आधार नहीं माना जा सकता। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार (लघु सिंचाई विभाग) द्वारा 475 दिनों की देरी से दायर अपील (Letters Patent Appeal) को खारिज कर दिया है। देरी माफ करने का आवेदन (Condonation of Delay) खारिज होने के साथ ही मूल अपील भी स्वतः समाप्त हो गई है।
मामले के मुख्य बिंदु
- अपीलकर्ता: लघु सिंचाई विभाग (Minor Irrigation Department), झारखंड सरकार।
- विवाद: एकल पीठ (Single Bench) के 5 अगस्त 2024 के आदेश को चुनौती देने में 475 दिनों की अत्यधिक देरी।
- सरकार की दलील: फाइलों का मूवमेंट, कानूनी राय लेने की प्रक्रिया, अभिलेख जुटाने और विभागीय प्रक्रियाओं के कारण देरी हुई।
- कोर्ट का फैसला: देरी माफ करने का आवेदन (Interlocutory Application) नामंजूर और अपील खारिज।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां और निष्कर्ष
- सीमा अवधि कानून (Limitation Act) सबके लिए समान: अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी विभागों को भी सीमा अवधि कानून का सख्ती से पालन करना होगा। केवल यह कह देना कि ‘फाइलों के आवागमन’ में समय लगा, देरी को उचित नहीं ठहराता।
- स्पष्टीकरण का अभाव: अदालत ने पाया कि सरकार की ओर से देरी के प्रत्येक दिन का संतोषजनक और ठोस कारण नहीं बताया गया।
- कार्रवाई में अत्यधिक विलंब:
- 5 अगस्त 2024 को एकल पीठ का आदेश आने के बाद शुरुआती तीन महीनों तक सरकार ने कोई प्रभावी कदम ही नहीं उठाया।
- विधि विभाग (Law Department) से केवल कानूनी राय प्राप्त करने में लगभग 10 महीने का समय लगा, जिसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण अदालत में नहीं दिया जा सका।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला: खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती फैसलों का संदर्भ देते हुए कहा कि “प्रशासनिक शिथिलता (Administrative sluggishness) और लापरवाही” को किसी भी सूरत में देरी माफ करने का कानूनी आधार नहीं माना जा सकता।

