अदालत की बड़ी टिप्पणी- “सिविल उपाय उपलब्ध होने मात्र से आपराधिक मुकदमा चलाने पर रोक नहीं लगाई जा सकती”
Ranchi News: जमीन की खरीद-बिक्री में होने वाले फर्जीवाड़े और धोखाधड़ी को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। अदालत ने जमीन बिक्री के नाम पर छह लाख रुपये की कथित ठगी के आरोपी आनंद कुमार सिंह को किसी भी तरह की राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने आरोपी द्वारा निचली अदालत की कार्यवाही को चुनौती देने वाली क्रिमिनल मिसलेनियस याचिका (Criminal Miscellaneous Petition) को सिरे से खारिज कर दिया।
क्या है पूरा मामला और कैसे हुई ठगी?
यह पूरा मामला हजारीबाग सदर थाना कांड संख्या-289/2019 से जुड़ा है। आनंद कुमार सिंह पर धोखाधड़ी के गंभीर आरोप हैं, जिनकी कार्यप्रणाली इस प्रकार थी:
- फर्जी मालिक बनकर किया करार: आरोप है कि आनंद कुमार सिंह ने खुद को एक कीमती जमीन का असली मालिक बताया। उसने शिकायतकर्ता और एक अन्य व्यक्ति को झांसे में लेकर अलग-अलग एग्रीमेंट (समझौता) कर लिया और उनसे एडवांस के तौर पर कुल छह लाख रुपये ऐंठ लिए।
- पहले ही बिक चुकी थी जमीन: बाद में जब पीड़ितों ने पड़ताल की, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। पता चला कि संबंधित जमीन तो बहुत पहले ही किसी अन्य व्यक्ति को बेची जा चुकी थी और आरोपी आनंद कुमार सिंह उस जमीन का मालिक था ही नहीं।
- रकम वापसी के चेक भी हुए बाउंस: पोल खुलने पर जब पीड़ितों ने पैसे वापस मांगे, तो आरोपी ने ‘मैट्रिक्स सर्विसेज एंड सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड’ के नाम से दो-दो लाख रुपये के तीन चेक थमा दिए। लेकिन जब इन्हें बैंक में लगाया गया, तो तीनों चेक बाउंस हो गए। इसके बाद पीड़ितों ने हजारीबाग सदर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई।
आरोपी की दलील: “यह केवल सिविल विवाद है”
मामले की पुलिस जांच में आरोपों को सही पाया गया और कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई, जिसके आधार पर निचली अदालत ने आईपीसी (IPC) की धारा 406 (अमानत में ख्यानत) और 420 (धोखाधड़ी) के तहत संज्ञान (Cognizance) लिया था। इसी संज्ञान और अदालती कार्यवाही को रद्द कराने के लिए याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में दलील दी कि यह पूरा मामला विशुद्ध रूप से दीवानी (Civil Nature) का है। जमीन के इस लेन-देन को लेकर पहले से ही एक ‘मनी सूट’ (Money Suit) कोर्ट में लंबित है, इसलिए इसे आपराधिक मामला नहीं माना जाना चाहिए।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: सिविल और आपराधिक मामले साथ चल सकते हैं
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता के अधिवक्ताओं ने आरोपी के तर्कों का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने शुरू से ही दुर्भावना के तहत खुद को जमीन का फर्जी मालिक बताकर लोगों को धोखा दिया, जो सीधे तौर पर एक गंभीर आपराधिक कृत्य है।झारखंड हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद आरोपी की याचिका खारिज करते हुए एक नजीर पेश करने वाली टिप्पणी की:
“यदि किसी एक ही घटना या लेन-देन से सिविल (दीवानी) और आपराधिक (फौजदारी), दोनों प्रकार के विवाद उत्पन्न होते हैं, तो केवल सिविल उपाय (Civil Remedy) या मनी सूट लंबित होने मात्र से आरोपी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने पर कोई रोक नहीं लगाई जा सकती।”
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केस डायरी और साक्ष्यों को देखने से प्रथम दृष्टया (Prima Facie) आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी और अमानत में ख्यानत का आपराधिक मामला पूरी तरह बनता है। ऐसे में निचली अदालत की कार्यवाही को रद्द करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।

