Prayagraj News: इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले पर सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने न केवल उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर चिंता व्यक्त की बल्कि विधि आयोग से पॉक्सो कानून में बदलाव के लिए सिफारिश भेजने पर विचार की। कोर्ट ने पाया कि पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाली एक युवती न तो हिंदी का कोई अखबार पढ़ सकती है और न ही अपने नाम के अलावा हिंदी में कुछ और लिखने में सक्षम है, वह एक बच्चे की मां बन गई है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की डिवीजन बेंच ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि राज्य में बुनियादी स्कूली शिक्षा का स्तर इतना गिर चुका है, जिससे बच्चों का भविष्य अधर में लटक रहा है।
किसने दाखिल किया था मामला
यह पूरा मामला राकेश यादव उर्फ पप्पू द्वारा दाखिल की गई एक याचिका से जुड़ा है। इसमें उसने उस लड़की को अदालत में पेश करने की मांग की थी जिसके साथ वह वर्ष 2025 में घर से चला गया था। कपल से एक बच्चे का जन्म हुआ था।
अदालत में जब लड़की से हिंदी अखबार पढ़ने और लिखने के बारे में पूछा गया, तो उसकी असमर्थता सामने आई। बेंच ने राज्य सरकार से सवाल करते हुए पूछा कि आखिर उस लड़की की शिक्षा सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही क्यों सीमित रह गई? सरकार यह सुनिश्चित करने में क्यों विफल रही कि वह कम से कम बारहवीं तक अपनी पढ़ाई जारी रख सके।
बच्चों की शिक्षा राज्य सरकार की जिम्मेदारी
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि राज्य की यह संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को सार्थक शिक्षा उपलब्ध कराए तथा उन्हें वयस्क होने तक शिक्षा से जोड़े रखे। इसके साथ ही युवाओं को प्रोफेशनल स्कील हासिल करने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए ताकि वे भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें।
सुनवाई के दौरान लड़की के पिता ने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए बताया कि वे पूरी तरह निरक्षर हैं, मजदूरी करके बमुश्किल 10 से 12 हजार रुपये कमाते हैं। अकेले ही अपने चार बच्चों व बुजुर्ग माता-पिता की दो जून की रोटी का भरण-पोषण कर रहे हैं।
गरीबी और अज्ञानता से अधिकारों से वंचित समाज के बड़ा तबका
अदालत ने भारतीय समाज की सच्चाइयों को बयां करते हुए कहा कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी और अज्ञानता के कारण कानून व संविधान के अधिकारों से अनजान रहता है। ऐसे में केवल सख्त कानूनों का अंधाधुंध अनुप्रयोग न्याय को आगे बढ़ाने के बजाय कई बार निर्दोष परिवारों के लिए अन्याय का सबब बन जाता है।
इसे ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने विधि आयोग को एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है कि वह पोक्सो एक्ट (POCSO Act) के उन प्रावधानों की समीक्षा करे जो किशोरों व नाबालिगों के आपसी संबंधों पर लागू होते हैं।
स्पेशल जजों के अधिकार की मांग
अदालत ने सुझाव दिया कि असाधारण परिस्थितियों और जागरूकता की कमी वाले मामलों में स्पेशल जजों को सजा तय करते समय व्यापक विवेकाधिकार मिलना चाहिए। साथ ही, कानून के अनभिज्ञता के कारण बिखर रहे परिवारों को बचाने के लिए सामुदायिक सेवा जैसे वैकल्पिक दंडों और सामाजिक वास्तविकताओं के आकलन पर भी विचार किया जाना चाहिए।

