Ranchi News: झारखंड हाई कोर्ट ने रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) की जमीन पर दशकों से हो रहे अवैध निर्माणों को लेकर एक कड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने इस पूरे मामले में गंभीर प्रशासनिक और संस्थागत विफलताओं को उजागर करते हुए दोषी सरकारी, नगर निगम और नियामक अधिकारियों के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) से आपराधिक जांच कराने का आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश तारलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने माना कि मामले की गंभीरता सीबीआई जांच की मांग करती है, लेकिन फिलहाल अदालत ने राज्य पुलिस और एसीबी को एफआईआर दर्ज कर विस्तृत जांच करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जरूरत पड़ने पर भविष्य में सीबीआई जांच का विकल्प खुला रहेगा। मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी 2026 को होगी।
1964-65 में अधिग्रहित भूमि पर अवैध निर्माण
अदालत ने बताया कि रिम्स की स्थापना के लिए वर्ष 1964-65 में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी की गई थी। भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत जमीन अधिग्रहित कर मुआवजा भुगतान कर दिया गया था, जिसके बाद यह भूमि पूरी तरह राज्य सरकार में निहित हो गई। इसके बावजूद वर्षों तक अवैध रूप से रजिस्ट्री, म्यूटेशन, लगान रसीद, नॉन-एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट, भवन नक्शा पास और यहां तक कि रेरा (RERA) की मंजूरी तक दी जाती रही।
जनहित याचिका से खुला मामला
यह पूरा मामला वर्ष 2018 से लंबित एक जनहित याचिका के दौरान सामने आया। हाई कोर्ट के निर्देश पर झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (झालसा) की सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना ने जांच कर रिपोर्ट सौंपी, जिसमें रिम्स परिसर की लगभग 7 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण की पुष्टि हुई। रिपोर्ट के अनुसार, रिम्स परिसर के भीतर मंदिर, दुकानें, झोपड़ियां, पार्क, बहुमंजिला आवासीय भवन, अपार्टमेंट और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बना दिए गए थे। अदालत ने कहा कि इन अतिक्रमणों से अस्पताल की सेवाएं प्रभावित हो रही थीं, स्वच्छता और सुरक्षा को खतरा था, खासकर गर्ल्स हॉस्टल के पास चोरी और छेड़खानी की घटनाएं सामने आईं।
अतिक्रमण हटाने का आदेश
अदालत ने 3 दिसंबर को अतिक्रमण हटाने का आदेश देते हुए 72 घंटे का समय दिया और जिला प्रशासन व पुलिस को कार्रवाई की अनुमति दी। कोर्ट ने दो टूक कहा कि रिम्स जैसी वैधानिक चिकित्सा संस्था की अधिग्रहित जमीन पर किसी भी तरह का निजी स्वामित्व स्वीकार्य नहीं है।
स्वामित्व के दावे खारिज
कुछ आवेदकों ने 1932 के खतियान, 2019 तक की लगान रसीद, बिक्री विलेख और नक्शा पास के आधार पर जमीन पर दावा किया था। लेकिन उपायुक्त, रांची द्वारा प्रस्तुत मूल अभिलेखों की जांच के बाद अदालत ने माना कि जमीन पूरी तरह अधिग्रहित हो चुकी थी और मुआवजा भी दिया जा चुका था। कोर्ट ने कहा कि बाद के किसी भी राजस्व या नगर निकाय दस्तावेज से स्वामित्व पुनर्जीवित नहीं हो सकता।
एसीबी जांच और कार्रवाई के निर्देश
हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि दोषी राजस्व अधिकारियों, सर्किल ऑफिसरों, नगर निगम, रेरा अधिकारियों सहित अन्य जिम्मेदार पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर एसीबी जांच कराए। साथ ही अवैध रजिस्ट्री, म्यूटेशन, नक्शा पास और प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई के भी निर्देश दिए गए।
मुआवजा मिलेगा, लेकिन सरकारी खजाने से नहीं
अदालत ने प्रभावित निवासियों की परेशानी को स्वीकार करते हुए कहा कि उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए, लेकिन यह राशि दोषी अधिकारियों और बिल्डरों से वसूली जाएगी, न कि सरकारी खजाने से।
बैंक और रिम्स प्रशासन भी घेरे में
कोर्ट ने सरकारी जमीन पर बिना जांच के ऋण देने वाले बैंकों और अतिक्रमण पर चुप रहने वाले रिम्स प्रशासन की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। बैंकों को आंतरिक जांच के निर्देश दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार
हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 17 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

