Ranchi News: हजारीबाग-बरही (एनएच-33) सड़क चौड़ीकरण के दौरान पेड़ों की कटाई को लेकर झारखंड हाई कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लिए गए मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर अदालत में सशरीर उपस्थित हुए। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ में हुई।
पांच साल में 20 हजार पौधे लगाने का दावा
कोर्ट ने एनएचएआई के प्रोजेक्ट डायरेक्टर से पूछा कि हजारीबाग-बरही सड़क के किनारे पिछले पांच वर्षों में पौधारोपण के लिए कितने पौधे खरीदे गए और इस पर कितनी राशि खर्च हुई। इस पर एनएचएआई की ओर से बताया गया कि सड़क किनारे करीब 20 हजार पौधे लगाए गए हैं, जिस पर लगभग आठ करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
जंगली पौधों को भी गिनने का आरोप
मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सामंता ने अदालत को बताया कि एनएचएआई अपनी रिपोर्ट में ऐसे जंगली पौधों को भी शामिल कर रहा है, जो स्वतः उग आते हैं। हकीकत में इतने पौधे लगाए ही नहीं गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पौधारोपण के बाद उनके संरक्षण और रखरखाव की व्यवस्था नहीं की जाती, जिसके कारण अधिकांश पौधे सूख जाते हैं।
एनएचएआई की पॉलिसी के पालन पर सवाल
सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि एनएचएआई की पॉलिसी के अनुसार पौधों के संरक्षण में स्थानीय लोगों और एनजीओ को शामिल किया जाना चाहिए, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। पीपल और महुआ जैसे स्थानीय प्रजाति के पौधे लगाए जाएं तो ग्रामीण स्वयं उनकी सुरक्षा करेंगे और कटाई नहीं होने देंगे। पेड़ों के संरक्षण की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों को सौंपी जा सकती है।
स्थानीय सहभागिता पर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश
मामले पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने एनएचएआई के रीजनल ऑफिसर को निर्देश दिया कि वे शपथ पत्र दाखिल कर यह बताएं कि राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे लगाए गए पौधों के संरक्षण में स्थानीय लोगों को शामिल करने की नीति पर अब तक क्या कार्रवाई की गई है। मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी 2026 को होगी।
स्थल निरीक्षण के लिए बनी थी पांच सदस्यीय समिति
उल्लेखनीय है कि इस मामले में हाई कोर्ट ने पहले ही पांच सदस्यीय समिति का गठन किया था, जिसे स्थल निरीक्षण कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया था। समिति को यह बताना था कि एनएच-33 के किनारे कितने पौधे लगाए गए, उनकी वर्तमान स्थिति क्या है, वे किस प्रजाति के हैं और क्या वे स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल हैं।

